कोलकाता मेडिकल कॉलेज मामले में हाईकोर्ट ने केस सीबीआई को सौंपा, ममता सरकार से सवाल- “समय बर्बाद हुआ तो गड़बड़ होगी, आप कैसे आश्वस्त कर सकते हैं कि गड़बड़ नहीं होगी”
पश्चिम बंगाल हाईकोर्ट ने मेडिकल कॉलेज प्रिंसिपल का बयान नहीं दर्ज करने पर ना केवल फटकार लगाई है बल्कि टिप्पणी की “वे इतने शक्तिशाली हैं कि सरकारी वकील उनका प्रतिनिधित्व कर रहा है।”
मेडिकल छात्रा से रेप और हत्या मामला
कोलकाता हाईकोर्ट – हम मामले को CBI को सौंपते है
कोलकाता हाईकोर्ट ने कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में मेडिकल छात्रा के बलात्कार और हत्या मामले की जाँच सीबीआई को सौंप दी है। मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार पर नाराजगी भी जताई है। हाईकोर्ट ने मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य को लेकर भी अप्रसन्नता ज़ाहिर की। हाईकोर्ट ने इस मसले पर जारी चिकित्सकों के आंदोलन की भावना को सही बताते हुए कहा “घटना बेहद भयानक है, हम प्रेस को चुप नहीं करा सकते। डॉक्टरों को अपनी भावनाएँ व्यक्त करने
का पूरा हक़ है।”
राज्य से तीखे सवाल किए हाईकोर्ट ने
कोलकाता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस टी एस शिवगनम और जस्टिस एच भट्टाचार्य की पीठ ने 9 अगस्त को 31 वर्षीय मेडिकल छात्रा के बलात्कार और हत्या मामले में दायर विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई की। हाईकोर्ट ने मेडिकल छात्रा के माता पिता से भी याचिका स्वीकार की। याचिकाओं में यह माँग थी कि, मामले को सीबीआई को ट्रांसफ़र किया जाए। राज्य की ओर से कोर्ट को आश्वस्त करने के लिए दिए तकों से हाईकोर्ट संतुष्ट नहीं हुई। राज्य की ओर कहा गया -“मामले को तेज़ी से निपटाया जा रहा है।” इस पर हाईकोर्ट ने कहा -“ऐसी आशंका है कि अगर समय बर्बाद हुआ तो कुछ गड़बड़ हो सकती है, आप कैसे आश्वस्त करते हैं कि, ऐसा नहीं होगा।”
मेडिकल कॉलेज प्रिंसिपल पर हाईकोर्ट की टिप्पणी
इस मामले को लेकर जितनी भी याचिका हाईकोर्ट में दायर हैं उन सभी में अस्पताल प्रशासक प्रिंसिपल संदीप कुमार घोष को लेकर टिप्पणियाँ हैं, और उन्हें बेहद प्रभावशाली बताया गया है। हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान राज्य सरकार से इस मसले पर तीखे सवाल किए। हाईकोर्ट ने तत्कालीन प्रिंसिपल संदीप घोष को लेकर कहा -“यह समझना मुश्किल है कि, प्रिंसिपल ने इस्तीफ़ा दिया लेकिन इस्तीफ़े पर क्या आदेश हुआ। इस्तीफ़े के बाद 22 अगस्त को उन्हे एनएमसी कोलकाता का प्रिंसिपल बना दिया गया, तो फिर उन्होंने इस्तीफ़ा क्यों दिया।” याचिकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता ने कोर्ट से कहा -“जिस प्रिंसिपल ने इस्तीफ़ा दिया वह इतना शक्तिशाली है कि कोई भी उसे छू नहीं सकता।” इस पर राज्य सरकार ने कहा – “विस्तृत जाँच की गई है। सीसीटीवी में जो भी व्यक्ति दिखाई दिया है, उसके बयान दर्ज किए गए हैं। जाँच उचित तरीके से जारी है। हमने एक को गिरफ़्तार किया है।” इस पर हाईकोर्ट ने कहा – “प्रिंसिपल सभी काम करने वाले डॉक्टरों के अभिभावक हैं। अगर उन्होंने कोई सहानुभूति नहीं दिखाई तो और कौन दिखाएगा?” इसके बाद हाईकोर्ट ने कहा -“वह पहला व्यक्ति है, जिसका बयान दर्ज किया जाना चाहिए था। वह संस्था का मुखिया है और क़ानून से उपर नहीं हैं। वे सरकारी अधिकारी हो सकते हैं, लेकिन आप क्यों सुरक्षा कर रहे हैं.. वे इतने शक्तिशाली हैं कि, सरकारी वकील उनका प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। बयान ही आधार है सर! कुछ कमी है।”
सुबह दस बजे सीबीआई को केस डायरी सौपें
हाईकोर्ट ने पूरे मामले की जाँच सीबीआई को सौंपे जाने का फैसला देते हुए कहा है कि, सभी याचिकाओं जिनमें पीड़िता के माता पिता की याचिका भी शामिल हैं उन्होंने स्वतंत्र निकाय से जाँच कराने का निर्देश देने की माँग की है, ताकि सबूतों के साथ छेड़छाड ना हो। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से कहा- “केस डायरी और अन्य रिकॉर्ड सुबह दस बजे तक सीबीआई को सौंप दीजिए।”
डॉक्टरों से कोर्ट ने कहा
याचिका की सुनवाई के अंतिम दौर में जबकि कोर्ट ने सीबीआई जाँच का आदेश कर दिया, हाईकोर्ट ने चिकित्सा पेशे के सदस्यों से आंदोलन वापस लेने का आग्रह किया। हाईकोर्ट ने कहा – “हम डॉक्टरों और छात्रों तथा आर जी कर मेडिकल कॉलेज के छात्रों द्वारा व्यक्त की गई भावनाओं की सच्ची सराहना करते हैं। हालाँकि डॉक्टरों की ओर से अपने रोगियों का इलाज करना एक पवित्र दायित्व है, खासकर उन रोगियों का जो समाज के संपन्न वर्ग से नहीं बल्कि सरकारी अस्पताल में आते हैं। इसीलिए हम चिकित्सा पेशे के सदस्यों से अपील करेंगे कि, राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों से चर्चा करें और अपना आंदोलन वापस लें ताकि अस्पताल आने वाले लोगों को परेशानी न हो।”