पुरातत्व संग्रहालय में आदिवासी महाकवि कालीदास की 1675 वीं जयंती आयोजित हुई…
बालाघाट। इतिहास एवं पुरातत्व शोध संस्थान संग्रहालय में प्रतिवर्षानुसार इस वर्ष भी आदिवासी महाकवि कालीदास पण्डों की 1675 वीं जयंती दिनांक 15 नवम्बर 2025 को अपरांह 3-30 बजे से संध्याकाल 5-30 बजे तक संगोष्ठी-काव्य चलती रही। जहाँ डॉ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार संग्रहाध्यक्ष इतिहास एवं पुरातत्व शोध संस्थान संग्रहालय बालाघाट की अध्यक्षता में आयोजित की गई। महाकवि कालीदास के छायाचित्र पर माल्यार्पण कर दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम प्रारंभ किया गया। उक्त अवसर पर डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार संग्रहाध्यक्ष ने महाकवि कालीदास के जीवन प्रसंग पर प्रकाश डालते हुए कहा कि महाकवि कालीदास का जन्म रामायण कालीन आदिवासी
एक छोटे से गांव मृगाडांड में 15 नवम्बर 350 ई. को हुआ था। मृगाडांड गांव रामगिरी पर्वत (रामगढ़ पर्वत) की तलहटी में बसा रामायण कालीन गांव है। जहाँ भगवान राम ने मारीच को दण्ड (डांड) दिया था। इसलिए इस गांव का नाम मृगाडांड पड़ा। (वर्तमान में छत्तीसगढ़ राज्य) कालीदास का जन्म मृगाडांड के पण्डो आदिवासी परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम शिवदास पण्डो तथा माता का नाम तारादेवी था। वे गाय- बैल चराते और हल जोतते थे। उनका विवाह उज्जैन के एक राजकुमारी विधोतमा (विधामती) से 16 नवम्बर 368 ई.को हुआ था, लेकिन उन्हें मालूम कालीदास अनपढ़ है, तो उन्हें छत से धकेल दिया, वे सीधे शिव लिंग पर गिरे। वे बहुत दुखी हुए। विधामती द्वारा घर से निकाले जाने पर, वे मृगाडांड में रहने लगे। करीब एक माह बाद उन्हें पता चला कि वाराणसी संस्कृत में शिक्षा का प्रमुख केंद्र है। वे वाराणसी चले गये और 6 वर्षों तक संस्कृत में अध्ययन कर वे 375 ई. में संस्कृत में पारंगत होकर मृगाडांड लौट आये। मृगाडांड के सरहद में स्थित रामगिरी पर्वत (रामगढ़ पर्वत) के एक गुफा में बैठकर ऋतुसंहार,मेघदूत और अभिज्ञान शाकुंतलम कुल तीन ग्रंथों की रचना की। इन तीनों ग्रंथों के लेखन के पश्चात उनकी ख्याति देश-विदेश में दूर-दूर तक फैल गई। इन तीनों ग्रंथों में पर्वत, नदी, ऐतिहासिक शहर आदिवासी संस्कृति, विभिन्न ऋतुओं आदिवासी स्त्रियों ज्यादातर अंकित किया है। आदिवासी महाकवि कालीदास के ऊपर वास्तविक खोज डाॅ.रामविजय शर्मा इतिहासकार और पुरातत्व विद् , सेवानिवृत्त तहसीलदार रायपुर (छत्तीसगढ़) ने की है। यह स्थल वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्य के सरगुजा जिला, उदयपुर तहसील में स्थित है। इस स्थल पर डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार संग्रहाध्यक्ष ने अवलोकन किया है।
उक्त अवसर पर राजेन्द्र कुमार शिवहरे, डाॅ.कुलदीप बिल्थरे, दिनेश कुमार नेमा, कुंजकिशोर विरुरकर, कविता गहरवार, कृष्णा कंसरे, ममता भलावी, रजत मरठे आदि उपस्थित होकर अपने-अपने विचारों से अवगत कराया।