नाम सामने, फिर भी सिंडिकेट के आगे बेबस अफसरशाह! ‘बीजनिगम बरमकेला धान घोटाले’ में कार्रवाई से क्यों कांप रहे जिम्मेदारों के हाथ-पांव?
सारंगढ़-बिलाईगढ़। ‘सांच को आंच क्या’… यह कहावत शायद सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के प्रशासनिक गलियारों में आकर उल्टी पड़ जाती है। जिले के बहुचर्चित ‘बीजनिगम धान घोटाले’ में जब कागजी सबूत, खसरा नंबर और 18 रसूखदार नाम उजागर होकर टेबल पर रखे जा चुके हैं, तब भी कार्रवाई के नाम पर प्रशासनिक सन्नाटा पसरा हुआ है। सबूत सामने होने के बावजूद भ्रष्ट सिंडिकेट पर हाथ डालने में जिम्मेदार अधिकारियों के ‘हाथ-पांव फूल रहे हैं’।
सवाल उठना लाजमी है कि आखिर वह कौन सी अनदेखी ताकत या राजनीतिक आका का हाथ इन आरोपियों के सिर पर है, जिसके दबाव में नियम-कानूनों का चाबुक चलाने वाले अफसर अचानक लाचार और बेबस नजर आने लगे हैं?
सबूत पक्के, फिर भी ‘तारीख पर तारीख’ का खेल!
एक ही जमीन के रकबे और खसरा नंबर का इस्तेमाल कर बीजनिगम (बरमकेला) और प्राथमिक सहकारी समितियों से दोहरा भुगतान उठाना कोई मामूली चूक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित ‘डिजिटल डकैती’ है।
कागजों पर 18 नाम उजागर: 18 संदिग्धों की सूची और उनके बैंक ट्रांजैक्शन की कड़ियां साफ-साफ घोटाले की गवाही दे रही हैं।
सॉफ्टवेयर का दुरुपयोग: बिना ऑपरेटरों और प्रबंधकों के पासवर्ड/क्रेडेंशियल के यह दोहरा खेल संभव ही नहीं था।
कार्रवाई के नाम पर लीपापोती: जांच के नाम पर सिर्फ फाइलें इधर से उधर खिसकाई जा रही हैं, जबकि कायदे से अब तक एफआईआर (FIR) दर्ज हो जानी चाहिए थी।
अधिकारियों की ‘सांप सूंघने’ जैसी खामोशी पर उबल रहे किसान
जब एक आम गरीब किसान का एक कट्टा धान ज्यादा हो जाता है, तो उस पर जब्ती की तुरंत कार्रवाई करने वाला प्रशासन, इतने बड़े संगठित फर्जीवाड़े पर मौनव्रत धारण किए बैठा है। जिले के ईमानदार किसानों और ग्रामीणों में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है।
सीधा सवाल: क्या अधिकारियों को डर है कि अगर इन 18 नामों पर शिकंजा कसा गया, तो वे उन ‘बड़े चेहरों’ के नाम उगल देंगे जो परदे के पीछे बैठकर इस सिंडिकेट को चला रहे थे? क्या यही डर अफसरों के कदम रोक रहा है?
जनता मांग रही जवाब: अब जांच नहीं, जेल और रिकवरी चाहिए!
प्रशासनिक सुस्ती को देखते हुए मांगें अब जांच के आश्वसनों तक सीमित नहीं हैं:
1.तत्काल FIR: 18 संदिग्धों समेत फर्जीवाड़े में शामिल कंप्यूटर ऑपरेटरों और समिति प्रबंधकों पर तुरंत आपराधिक मामला दर्ज हो।
3.संरक्षणदाताओं का पर्दाफाश: उन आला अधिकारियों और राजनीतिक चेहरों के नाम सार्वजनिक किए जाएं जो इस पूरे मामले को ठंडे बस्ते में डालने का दबाव बना रहे हैं।
यदि जिला प्रशासन ने जल्द ही इन ‘रसूखदारों’ पर सख्त कानूनी डंडा नहीं चलाया, तो यह साफ हो जाएगा कि यह घोटाला सिर्फ बिचौलियों का नहीं, बल्कि व्यवस्था की मौन सहमति से हुआ महा-फर्जीवाड़ा था!