डॉ. राम विजय शर्मा ने हट्टा की बावड़ी पर किया शोध…
डॉ. राम विजय शर्मा इतिहासकार, पुरातत्ववेता एवं अंतर्राष्ट्रीय शोधकर्ता रायपुर भारत एवं डॉ. वीरेन्द्र सिंह गहरवार राष्ट्रीय अध्यक्ष इतिहास एवं पुरातत्व शोध संस्थान संग्रहालय बालाघाट (मध्यप्रदेश) ने संयुक्त रूप से हट्टा की बावड़ी पर ऐतिहासिक शोध किया। हट्टा गाँव बालाघाट से 22 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। हट्टा की बावड़ी 16वीं-17वीं शताब्दी की एक ऐतिहासिक और कलात्मक जलसंरचना है। गोंड राजा हटे सिंह वल्के द्वारा इसका निर्माण किया गया था जिसमे 8 मंजिल है लेकिन 3 तल दिखते है और शेष 5 तल पानी के अन्दर है।

स्थापत्य कला का यह अद्भुत नमूना है बावड़ी से सुरंग लांजी किला और मंडला किला तक अन्दर अन्दर जाता है। सुरक्षा के कारणों से इसे बंद कर दिया गया है। यह युद्ध के समय जल आपूर्ति के लिए बनायीं गयी थी। इस बावड़ी में जल काहा से आता है इसके स्रोत का आज भी रहस्य बना है। इस बहुमंजिला जलसंरचना पर बेहतरीन नकाशी की गयी है। इस बावड़ी पर 3 राज वंशो प्रभाव रहा है जिनमे हैहय राजवंश, गोंड राजवंश और भोंसले राजवंश प्रमुख है। इसकी वास्तुकला पर इन 3 राजवंशो की शैलियों की झलक मिलती है। राजा हटे सिंह ने इसका निर्माण केवल पानी के लिए ही नही बल्कि सैनिको के छिपने आराम करने तथा पेयजल की सुविधा के लिए किया गया था। यह बावड़ी विशाल चट्टानों को काट कर बनायीं गयी थी। इसके प्रथम तल पर 10 स्तम्भ है। जबकि निचले तल पर 8 अलंकृत स्तंभों पर आधारित बरामदे और कक्ष बने हुए है। बावड़ी के मुख्य द्वार पर 16वीं शताब्दी के चतुर्मुखी शिव और अम्बिकादेवी (हाथ में श्रीफल लिए) की सुन्दर नकाशीदार प्रतिमाये पर्यटकों का स्वागत करती है कुछ लोगो का मानना है की इस बावड़ी की नीव नागपुर शहर को बसाने वाले राजा बुलन्दशाह ने 17वीं शताब्दी में रखी थी बाद में हटे सिंह वल्के ने इसका विस्तार किया जिसके नाम इस गाँव का नाम हट्टा पड़ा ।

भोंसले राजवंश के शासन के दौरान सामंत अपनी सेनाओ को याहा छिपाते थे। गर्मियों में तापमान कम रखने के लिए और पानी ठंडा रखने के लिए इसे जमीन के अन्दर बहुमंजिला बनाया गया था । इसकी संरचना 22X12 मीटर के घेरे में फैली है स्थानीय आदिवासियों के लिए यह केवल एक स्मारक नही बल्कि आदिवासी विरासत की हिस्सा है इसके निर्माण में पत्थरों को जोड़ने के लिए चुना गुड के घोल और बेल के मिश्रण का उपयोग किया गया था इसी कारण यह संरचना आज तक मजबूती के साथ खड़ी है। भोंसले काल के बाद 1818 ईस्वी में यह बावड़ी लोधी जर्मीदार नागपुरे परिवार के पास आई । जमीनदार परिवार ने 1988 ईस्वी में इसे पुरातत्व विभाग को सौंप दिया। जमीनदार प्रताप सिंह बताते है की आज से 20 25 साल पहले बालाघाट के तहसीलदार इस बावड़ी में पटवारियों की मासिक बैठक लेते थे। शोध कैंप में हट्टा जमीनदार प्रताप सिंह नागपुरे, श्री दिनेश नेमा, श्री राजेंद्र ब्रम्हे (से.नि. ए. एस. आई. नागपुर ) तथा आदिवासी जनता उपस्थित रह कर शोध कैंप को सफल बनाये।
