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कोयले की धरती पर विकास का धुआं, विधायक पर उठते सवाल…

रायगढ़ लैलूंगा में सत्ता विरोध की आहट, सोशल मीडिया बना नया विपक्ष लैलूंगा विधानसभा… प्रदेश का शायद सबसे विचित्र राजनीतिक और भौगोलिक इलाका। रायगढ़ शहर के पांच वार्ड इसकी सीमा में आते हैं, लेकिन विकास की रफ्तार कई गांवों तक पहुंचते-पहुंचते जैसे थक जाती है। विडंबना यह है कि जिस धरती के नीचे कोयले का अकूत खजाना है, उसी धरती पर सड़क, पानी, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे सवाल आज भी खदानों की धूल में दबे पड़े हैं। सवाल यह नहीं कि संसाधन नहीं हैं, सवाल यह है कि उनका लाभ आखिर पहुंचा किस तक?
ढाई साल पहले कांग्रेस ने निष्क्रियता के आरोपों के बीच तत्कालीन विधायक चक्रधर सिदार का टिकट काटकर नया चेहरा विद्यावती सिदार सामने रखा। उम्मीद थी कि नया नेतृत्व नई ऊर्जा लाएगा। लेकिन आज क्षेत्र में उल्टी तुलना सुनाई देने लगी है। कांग्रेस के कई पुराने कार्यकर्ता और आम लोग यह कहते मिल जाते हैं कि “चक्रधर कम बोलते थे, लेकिन लोगों के बीच दिखते तो थे।”
राजनीति में कभी-कभी सबसे कठोर विपक्ष सामने वाली पार्टी नहीं, बल्कि मोबाइल का कमेंट बॉक्स बन जाता है। रायपुर के कांग्रेस शिविर से नेताओं को मीडिया और सोशल मीडिया में सक्रिय रहने का संदेश मिला। लैलूंगा की विधायक ने भी सक्रियता बढ़ाई, लेकिन हर नई पोस्ट के नीचे विकास का रिपोर्ट कार्ड खुलने लगा।

मुड़ागांव में जंगल कटाई, प्रगति नगर की कार्रवाई, धौराभांटा की जनसुनवाई… सोशल मीडिया पर लोग एक-एक मुद्दा गिनाकर पूछ रहे हैं कि विरोध सिर्फ फोटो तक सीमित था या उसका कोई असर भी हुआ? राजनीति में धारणा कई बार वास्तविकता से बड़ी हो जाती है, और फिलहाल यही धारणा विधायक के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनती दिख रही है।
दूसरा मोर्चा संगठन का है। कांग्रेस के भीतर दबे स्वर अब फुसफुसाहट से आगे बढ़कर चर्चा बनने लगे हैं। चुनाव में मेहनत करने वाले कुछ कार्यकर्ताओं का आरोप है कि उन्हें अब महत्व नहीं मिल रहा। वहीं कई स्थानीय नेताओं का मानना है कि विधायक के पति कुंज बिहारी की बढ़ती सक्रियता ने संगठन में समानांतर शक्ति केंद्र की चर्चा को जन्म दिया है। इन आरोपों पर विधायक की ओर से कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन राजनीति में कई बार चर्चाएं भी माहौल बना देती हैं।

कमजोर नेतृत्व क्षेत्र का नुकसान
लैलूंगा की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहां खदानें बढ़ीं, उद्योग बढ़े, उत्पादन बढ़ा… लेकिन क्या उसी अनुपात में गांव भी बढ़े? यह सवाल लगातार उठ रहा है। कोल ब्लॉक और बड़े उद्योगों से घिरे इस इलाके में आज भी सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और पेयजल जैसे मुद्दे चुनावी भाषणों से बाहर नहीं निकल पाए। स्थानीय लोग आरोप लगाते हैं कि उद्योगों की सीएसआर राशि का असर गांवों में उतना दिखाई नहीं देता, जितना कागजों में दिखाई देता है।
अदाणी समूह समेत बड़े औद्योगिक घरानों की मौजूदगी वाले इस क्षेत्र में विपक्ष लगातार यह सवाल उठाता रहा है कि उद्योगों और स्थानीय हितों के बीच संतुलन बनाने में जनप्रतिनिधियों की भूमिका और अधिक प्रभावी क्यों नहीं रही। यह राजनीतिक आरोप हैं, जिन पर अलग-अलग दलों की अपनी-अपनी दलीलें हैं, लेकिन इतना तय है कि यह मुद्दा चुनाव तक जीवित रहने वाला है।

कांग्रेस की निष्क्रियता और भाजपा के अंतर्कलह का फायदा किसे

लैलूंगा की राजनीति की एक और खासियत है कि यहां मतदाता किसी दल के स्थायी नहीं, अपने फैसले के स्थायी हैं। पिछले चुनाव में भाजपा बेहद कम अंतर से हार गई थी। उस हार में विपक्ष से ज्यादा चर्चा भाजपा की अंदरूनी राजनीति की हुई थी। अब यदि वही स्थिति दोबारा बनी और कांग्रेस के खिलाफ सत्ता विरोधी माहौल भी मजबूत हुआ, तो मुकाबला पहले से कहीं अधिक दिलचस्प हो सकता है।
यही कारण है कि युवा नेता रवि भगत की सक्रियता पर भी राजनीतिक नजरें टिक गई हैं। टिकट न मिलने की पीड़ा, पत्नी की जिला पंचायत अध्यक्ष पद की दावेदारी ठुकराए जाने का अनुभव और अब संगठन से दूरी, इन सबने उन्हें एक अलग राजनीतिक पहचान दी है। यदि भाजपा फिर अंतर्कलह में उलझी तो रवि भगत समीकरण बदल सकते हैं, और यदि भाजपा एकजुट रही तो भी वे स्थानीय राजनीति का महत्वपूर्ण चेहरा बने रहेंगे।

फिलहाल लैलूंगा की राजनीति में सबसे बड़ी अदालत जनता का मोबाइल बन चुका है। वहां लाइक से ज्यादा कमेंट पढ़े जा रहे हैं और पोस्टर से ज्यादा प्रदर्शन का हिसाब मांगा जा रहा है। चुनाव में अभी वक्त है, लेकिन जनता ने संकेत दे दिया है कि इस बार सिर्फ चेहरे नहीं, काम भी तौले जाएंगे। लैलूंगा अब केवल सत्ता बदलने वाली सीट नहीं, बल्कि नेताओं का रिपोर्ट कार्ड जांचने वाली विधानसभा बनती जा रही है।

Sunil Agrawal
Sunil Agrawal
Chief Editor - Pragya36garh.in, Mob. - 9425271222
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