Author: Sunil Agrawal

  • स्व.जगन्नाथ अग्रवाल (जगन सेठ) की स्मृति में हुआ रक्तदान शिविर….

    स्व.जगन्नाथ अग्रवाल (जगन सेठ) की स्मृति में हुआ रक्तदान शिविर….

    54 लोगों ने किया रक्त का दान..

    सुनील अग्रवाल खरसिया। नगर के प्रसिद्ध दंत रोग विशेषज्ञ डॉ विकास अग्रवाल के दादा स्व.जगन्नाथ अग्रवाल जगन (सेठ) झाराडीह वाले की स्मृति में रविवार को सिविल अस्पताल खरसिया में रक्तदान शिविर का आयोजन किया गया जिसमे 54 यूनिट ब्लड का संग्रह किया गया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में युवाओं एवं महिलाओं ने भी रक्तदान किया। शिविरके आयोजन में महिला जागृति शाखा खरसिया तथा नगर की समाजसेवी संस्था हेल्पिंग हैंण्ड़स क्लब का सराहनीय योगदान रहा।


    समाजसेवा में हमेशा अग्रसर रहने वाली स्व.जगन्नाथ अग्रवाल की धर्मपत्नी श्रीमती नर्मदा अग्रवाल ने दीप प्रज्वलित कर शिविर का शुभारंभ किया, तत्पश्चात रक्तदान प्रारंभ हुआ, जिसमें नगर के युवाओं, युवतियों सहित वरिष्ठ नागरिकों ने भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया और शिविर में अपने रक्त का दान किया। मुख्य अतिथि के रूप में नगर पालिका परिषद खरसिया के अध्यक्ष प्रतिनिधि सुनील शर्मा ने रक्तदान को सबसे बड़ा दान  बताते हुए स्वेच्छिक रक्तदान के लिए युवाओं को प्रोत्साहित किया। ब्लड डोनेट कैंप में क्लब के सदस्यों, आमजन के साथ खरसिया चौंकी प्रभारी उपनिरीक्षक नंद किशोर गौतम द्वारा भी रक्तदान किया गया। खरसिया चौंकी के निरीक्षण के लिये पहुंचे रायगढ़ पुलिस अधीक्षक संतोष सिंह ने भी अपने मातहतों के साथ कैंप में पहुंचकर युवाओं की हौंसला आफजाई की। आयोजक द्वारा शिविर में पहुंचे अतिथियों को प्रतीक चिन्ह भेंट कर उनका सम्मान किया। रक्तदान के इस कार्यक्रम में प्रेस क्लब अध्यक्ष रामनारायण सोनी (शंटी), सुनील अग्रवाल, प्रहलाद बंसल, थाना प्रभारी सुम्मत राम साहू, हॉस्पिटल प्रभारी डॉक्टर दिलेश्वर पटेल सहित हेल्पिंग हैंड व मायुम की जागृति शाखा के सदस्य उपस्थित रहे।

  • जज के बंगले में मिला भृत्य का शव, मृतक के भाई ने लगाया ये आरोप…

    जज के बंगले में मिला भृत्य का शव, मृतक के भाई ने लगाया ये आरोप…

    कोरिया। बैकुंठपुर जिला सत्र न्यायालय के जज के बंगले में भृत्य का शव मिला है. मृतक जिला सत्र न्यायालय में ही भृत्य था. इस मामले में पुलिस ने पंचनामा कार्रवाई के बाद शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है. पुलिस का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही मृत्यु के कारणों का खुलासा हो पाएगा।

    इस बारे में मृतक के बड़े भाई ने बताया कि उनका छोटा भाई महमूद आलम बैकुंठपुर न्यायालय में भृत्य का काम करता था. बीते 3 दिनों से वह जिला सत्र न्यायालय के बंगले में रह रहा था. उन्होंने बताया कि आज सुबह लगभग 9 बजे जज साहब के बंगले से ड्राइवर उनके घर आया और उसके बाद जब वह जज साहब के बंगले पहुंचा तो वहां देखा कि उनका भाई मृत पड़ा हुआ है।

    मृतक के भाई ने आरोप लगाया है कि उसका भाई शोषण का शिकार हुआ है. फिलहाल पुलिस पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार कर रही है.
    इस बारे में नगर निरीक्षक बैकुंठपुर केके शुक्ला का कहना है कि कचहरी पारा निवासी महमूद आलम न्यायालय में भृत्य के पद पर कार्य करता था. जिसका शव जिला सत्र न्यायालय के जज के बंगले में बरामद हुआ है. मृत्यु का कारण अज्ञात है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही वे कुछ बता पाएंगे।

  • आईजी डांगी का कहना वैक्सीन को लेकर अफवाह फैलाने वालों पर होगी कार्रवाई….

    आईजी डांगी का कहना वैक्सीन को लेकर अफवाह फैलाने वालों पर होगी कार्रवाई….

    बिलासपुर। कोविड-19 वैक्सीन के संबंध में लोगों में भ्रम पैदा करने वाले संदेश सोशल मीडिया में वायरल करने वाले असामाजिक तत्वों के खिलाफ बिलासपुर आईजी रतनलाल डांगी ने तत्काल कार्रवाई की बात कही है. इस संबंध में उन्होंने सभी पुलिस अधीक्षकों को निर्देशित किया है।
    आईजी डांगी ने कहा कि यह देखने में आ रहा है कि कुछ लोग जानबूझकर, तो कुछ लोग मामले की गंभीरता को न समझते हुए कोविड-19 वैक्सीन के बारे में बेबुनियाद मैसेज सोशल मीडिया के माध्यम से बिना सोचे-समझे वायरल करते हैं, जो कि न केवल मानवता के खिलाफ है बल्कि एक अपराध भी है. ऐसे असामाजिक तत्वों के खिलाफ कार्रवाई करने सभी पुलिस अधीक्षकों को निर्देशित किया गया है।

    उन्होंने कहा कि ऐसी कार्रवाई न केवल मैसेज बनाने वाले के खिलाफ होगी, बल्कि मैसेज को लोगों में वायरल करने वालों के खिलाफ भी राष्ट्रीय आपदा अधिनियम के साथ साथ महामारी अधिनियम के तहत भी की जाएगी. लोगों से अपील भी किया है ऐसे भ्रम से दूर रहें, साथ वैक्सीन सुरक्षित को सुरक्षित बताते हुए अपना नंबर आने से वैक्सीन जरूर लगाने की अपील की।

  • नौकरी लगाने के नाम पर 19 लाख रूपये की ठगी,मंत्री शिव डहरिया के खिलाफ एफ. आई. आर. दर्ज करने की मांग…

    नौकरी लगाने के नाम पर 19 लाख रूपये की ठगी,मंत्री शिव डहरिया के खिलाफ एफ. आई. आर. दर्ज करने की मांग…

    रायगढ़। छत्तीसगढ़ के राजधानी रायपुर में भारतीय जनता पार्टी अनुसूचित जाति मोर्चा का एक प्रतिनिधि मंडल ने सरस्वती नगर थाना पहुँचकर नौकरी दिलाने के नाम पर की गई 19 लाख रुपए की ठगी के मामले में प्रदेश सरकार के मंत्री शिव डहरिया को सह आरोपी बनाने की मांग कर ज्ञापन सौंपेगा।

    प्रतिनिधि मंडल का नेतृत्व अजा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष नवीन मार्कण्डेय करेंगे। भाजपा अजा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष श्री मार्कण्डेय ने बताया कि मंत्री डहरिया और बलरामपुर कलेक्टर का एकदम ख़ास बताकर जांजगीर-चाँपा ज़िला के मूल निवासी जीवमंगल सिंह टंडन ने सन 2018-19 के दरम्यान 06 बेरोज़गार युवकों से नौकरी लगाने के नाम पर 19 लाख रुपए की उगाही की थी।

    बाद में पीड़ित युवकों की शिकायत पर एसएसपी द्वारा आरोपी टंडन के ख़िलाफ़ सरस्वती नगर थाना में धोखाधड़ी का मामला दर्ज कर आरोपी को गिरफ़्तार कर लिया गया। श्री मार्कण्डेय ने कहा कि आरोपी टंडन ने मंत्री डहरिया को 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले 40 लाख रुपये चुनाव जीतने के लिए देने का ख़ुलासा किया है। भाजपा अजा मोर्चा ने इसे गंभीर आपराधिक मामला बताते हुए इस मामले में मंत्री डहरिया को सह आरोपी बनाने की मांग की है।

  • इस टीआई पर लगा लकड़ी तस्करी का आरोप, 2 लाख का सागौन जब्त…

    इस टीआई पर लगा लकड़ी तस्करी का आरोप, 2 लाख का सागौन जब्त…

    भानुप्रतापपुर। उत्तर बस्तर कांकेर जिले के लोहत्तर थाना प्रभारी महेश कुमार साहू पर सागौन लकड़ी की तस्करी का आरोप लगा था रविवार की रात कांकेर जिले और राजनांदगांव जिले की सीमा पर एक पिकअप में 2 लाख मूल्य की दीवान पलंग, डायनिंग टेबल सहित अन्य अर्धनिर्मित फर्नीचर की लकड़ी बरामद हुई थी।

    मुखबिर की सूचना पर लोहत्तर थानेदार (कांकेर) महेश कुमार साहू द्वारा सागौन से अवैध रूप से निर्मित फर्नीचर जिसमें दीवान, सोफासेट, डायनिंग आदि लोहत्तर से कहीं बाहर ले जाने वाले हैं।

    सूचना पाकर वनमण्डलाधिकारी मनीष कश्यप (भा.व.से.)एवं उप वनमण्डलाधिकारी आर.के.रायस्त के निर्देशन में वन परिक्षेत्र अधिकारी देवलाल दुग्गा के नेतृत्व में दो टी गठित कर लोहत्तर से बाहर जाने वाले संभावित रास्ते पर तैनात किया गया।
    रात्रि लगभग 12:40 बजे एक पिक-अप गाड़ी क्रमांक CG24L2558 दुर्गूकोन्दल और मानपूर सीमा पर पहुंचा, जिसे रोकने पर गाड़ी में सागौन से निर्मित फर्नीचर पाया गया।

    इसके कागजात पूछने पर कोई कागजात नहीं होना बताया गया. पिक-अप गाड़ी के पीछे चार मोटर साइकिल में रायफल लेकर पुलिस वाले चल रहे थे. पिक-अप पकड़ाने पर गाड़ी ड्राइवर के साथी एवं पुलिस वाले फरार हो गए. वन विभाग की टीम द्वारा गाड़ी को जप्त कर भानुप्रतापपुर वन विश्राम गृह लाकर लकड़ी का नापजोख किया गया जप्तीनामा तैयार किया गया और वन अपराध प्रकरण क्रमांक 11339/17 दिनांक 14/06/2021 दर्ज कर विवेचना में लिया गया है।

    जप्त कुल लकड़ी दीवान 4 सेट =1.584घ.मी., दरवाजा फ्रेम 2 नग =0.390घ.मी., डायनिंग 1सेट=0.768 घ.मी.और चौखट कड़ी 4 नग =0.008 घ.मी.कुल =2.750घ.मी. अनुमानित कीमत 200000  ( दो लाख रुपए) आंकी गई है।

    स्थानीय विधायक एवं विधानसभा उपाध्यक्ष मनोज सिंह मंडावी ने इस मामले में संज्ञान लेते हुए कलेक्टर चंदन कुमार से कहा कि

    मामले की पड़ताल कर उपरोक्त थानेदार पर कार्रवाई करें इस तरह के अधिकारियों को किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. उन्होंने कहा कि जिन्हें शासन ने समाज एवं संसाधनों की रक्षा हेतु तैनात किया है वहीं चोरी में संलिप्त हैं।

    वहीं इस मामले में थाना प्रभारी महेश कुमार साहू ने कहा पकड़ी गई लकड़ी मेरी नहीं है और न ही मैं इस बारे में कुछ जानता हूं।

  • पत्रकार आपको हमेशा दूध का धुला चाहिए !

    पत्रकार आपको हमेशा दूध का धुला चाहिए !

    लव, वार और बाजार में सब कुछ जायज है! पहले पान मसाले की फैक्टरी खोलो. कैंसर के मरीज अपने आप पैदा हो जाएंगे. फिर उनके इलाज के लिए अस्पताल खोलो. मुनाफा ठीक ठाक चाहिए तो पान मसाला कंपनी के रिसर्च ऐंड डेवलपमेंट विंग को नए नए प्रयोग की छूट दो. जरूरत पड़े तो ज्यादा से ज्यादा इन्वेस्ट करो. जितने ज्यादा लोग खाएंगे, उतना मुनाफा बढ़ेगा. जितने ज्यादे फ्लेवर होंगे उतने ज्यादे कस्टमर होंगे. ज्यादा से ज्यादा लोग खाएंगे तो ज्यादा से ज्यादा लोग अस्पताल भी पहुंचेंगे. ज्यादा से ज्यादा दवाइयां भी बिकेंगी. ‘किस्म किस्म’ की सहूलियतें इजाद करो, अस्पताल में भी मरीज को बेहतर से बेहतर सहूलियतें दो. जब आप बेहतर सहूलियत दोगे. तभी न उसकी कीमत वसूलने के हकदार होगे, और तभी सरकारी अस्पतालों का खटारापन बेपर्दा होगा. न क्वालिटी पर बात करते वक्त कीमत की तुलना करना बेईमानी है. ऊंचे लोगों की पसंद ऊँची ही होती है.

    हां, महंगे इलाज का टेंशन भी नहीं देना है. अब इंश्योरेंस कंपनी खोल लो. लोगों को बताओ कि कैंसर से तनिक न घबराए. इत्मीनान से पान मसाला खाएं. इसके बाद अस्पताल पहुंचेगे तो इंश्योरेंस कंपनी संभाल लेगी. और मान लीजिए ख़ुदा न खास्ता कोई घटना दुर्घटना हो गई. तो भी परेशान न हो जिंदगी के साथ भी जिंदगी के बाद भी का मुकम्मल इंतजाम है. दाह संस्कार से लेकर बेटी की शादी और बेटे की पढाई तक का पूरा इंतजाम है. कितनी वेल प्लान्ड है न एक कन्ज्यूमर की लाइफ. अब आप इत्मीनान से कन्ज्यूमर फ्रेंडली अखबार पढ़िए और चैनल भी देखिए. जानिए कि क्यों सैफ से शादी करना करीना के लिए आसान नहीं था. अरे रे रे…. बोर हो रहे हैं? तैमूर भी बहुत बोर हो रहा होगा इन दिनों. इसमें भी किसी न किसी का फायदा ही है.

    आइए अब टॉपिक चेंज करते हैं. वाकई आप बोर हो रहे होंगे. दूरदर्शन की खबरों से भारत में टीवी जर्नलिज्म की एंट्री होती है. अखबार या प्रिंट जर्नलिज्म की एक अपनी सीमा थी. सो उससे कुछ आगे की सोची गई. मगर तेवर और मिजाज अखबारी ही रहा. अर्थात फोकस खबरों पर ही रहा. सुंदर, सौम्य, शालीन चेहरों को खबरें पढ़ते सुनने का भी एक अपना आनंद था. मगर दूरदर्शन ठहरा सरकारी चैनल. उसकी अपनी सीमाएं थी. फिर वह सरकार से असहमत लोगों को कब तक रोक पाएगा. सही बात तो यही थी कि वह तब भी सरकारी भोंपू ही था.

    सो निजी चैनलों के जरिए वैरायटी का इंतजाम किया गया. इन्वेस्टर का धर्म ही है मुनाफा कमाना. यह उसकी नेचुरल च्वाइस है. आखिर कोई क्यों इन्वेस्ट करेगा? कोई तो लॉजिक होनी चाहिए? फिर चल निकला कारोबार. मगर अखबारी दुकानों को बगले झांकने की नौबत आ गई. फिर उन्होंने भी नए नए प्रयोग शुरू किए. दिल्ली, लखनऊ, पटना और भोपाल का अखबार वाराणसी, गोरखपुर जैसे अपेक्षाकृत छोटे महानगरों तक ग्राहक की तलाश में पहुंचा. बलिया जैसा नितांत पिछड़ा जिले का एडिशन पढ़ने के बाद तो वहां के लोगों के पांव जमीन पर नहीं थे. भरोसा होने लगा. अब बैरिया, सिकंदरपुर और रसड़ा जैसे दूरदराज के इलाकों में भी विकास की आंधी पहुंचने वाली है, बिल्कुल बुलेट ट्रेन वाली रफ्तार से. वहां के छुटभैया नेता भी बड़े इत्मीनान से मास्क बांट कर आज फोटो खिंचवा रहे है।

    लगता है लोकल को लेकर कुछ ज्यादा ही वोकल हो गया. आइए फिर फ्लेवर बदलते हैं. दूरदर्शन के मेट्रो चैनल पर पत्रकारिता के महानायक सुरेंद्र प्रताप सिंह का उपहार सिनेमा अग्निकांड वाला एपिसोड देख देश भाव विह्वल हो उठा. इन्वेस्टरों को टीवी जर्नलिज्म में नया स्कोप नजर आने लगा. नए नए चैनल आए. तर्क दिया गया कि जितने ज्यादे चैनल होंगे उतनी ज्यादे वैरायटी होगी. उतना ही ज्यादा लोकतंत्र मजबूत होगा. इतना बड़ा देश है. कोई इग्नोर नहीं फील करेगा. सबकी आवाज दिल्ली तक गूंजेगी. खबरें घटना स्थल से सीधे लाइव होने लगी. दर्शकों के मनोरंजन का पुख्ता इंतजाम हो गया. मगर मन को क्या कीजिएगा. वह विज्ञापन आपने देखा है या नहीं. जिसमें रीतिकालिन नायिका अदा के साथ कहती है, क्या करें, कंट्रोल नहीं होता. तो हां, मन की क्षुधा तो सुरसा की तरह बढ़ती ही जाती है.

    मार्केटिंग का एक अलग ही फंडा है. आप लगातार मेरी साड़ी से उसकी साड़ी सफेद कैसे कह कर डिटर्जेंट नहीं बेच सकते. बीच बीच में फ्लेवर चेंज करते रहना चाहिए. बताइए कि इसके लिए नींबू वाला डिटर्जेंट भी जरूरी है. बीच बीच में पूछते रहिए कि आपके टूथपेस्ट में नमक है या नहीं. इससे नए लोग जुड़ेंगे. प्लस पुराने कस्टमर भी कूल कूल चेंज फील करते रहेंगे.

    बातचीत के दौरान मेरे एक टीवी जर्नलिस्ट मित्र ने कभी बताया था कि लोग रेप की खबर पहले पढ़ते थे. फिर टीवी पर देखने सुनने लगे. टीवी वालों को टीआरपी बनाए रखनी थी. सो नाट्य रूपांतरण का प्रयोग शुरू हुआ. लोग बाग चाव से इंज्वॉय करने लगे. भूख बढाने वाला टॉनिक इतना कारगर रहा कि लोग सीधे रेप के सीन की हसरत पालने लगे. तकनीक सुलभ दौर में रेपिस्ट विधिवत वीडियो वायरल करने लगे. तारक मेहता का उल्टा चश्मा वाली टप्पू सेना ने तो टीवी की सुर्खियां बटोरने के लिए किडनैपिंग का भी विधिवत प्रयोग किया.

    किसी दौर में कलकत्ता मतलब द स्टेट्समैन हुआ करता था. हमारे मुहल्लों गलियों में लगे होर्डिंग्स बैनर के जरिए इस बात की बार बार तस्दीक की जाती थी कि आप कलकत्ता में रह रहे हैं तो स्टेट्समैन जरूर पढ़ते होंगे. बार बार एक ही बात रटाई जाएगी तो जाहिर है एक न एक दिन आप यह रट लेंगे कि कोरोना से बचने के लिए मास्क होना ही चाहिए, बाकी शरीर भले नंग धड़ंग रहे. क्योंकि प्रचार वाले ने यह तो बताया ही नहीं कि पूरे कपड़े पहनने के बाद मास्क भी पहनना है. जानकार बताते हैं कि टेलीग्राफ की लांचिंग से पहले विधिवत सर्वे करवाया गया. आईआईएम कलकत्ता के मैनेजमेंट गुरुओं ने आनंद बाजार समूह को यह मशविरा दिया कि भले आप बांग्ला के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले अखबार के पब्लिशर हैं, अंग्रेजी पाठकों के लिए कलकत्ता मतलब स्टेट्समैन है. इसिलिए इस तिलिस्म या एडिक्शन को तोड़ना ही सबसे बड़ी चुनौती है.

    यही वजह है कि द टेलीग्राफ की लांचिंग के वक्त टार्गेट रीडर गैर बांग्ला भाषी अंग्रेजीदा लोग थे. विशेष तौर पर बंगाल-बिहार (तब झारखंड नहीं था) का सीमावर्ती अंचल. क्योंकि कलकत्ता मोह को भेदना भी इतना आसान नहीं था. हालत तो यह है कि स्टेट्समैन ने बंगाल की सीमा के बाहर पैर पसारने की कोशिश की तो इसी ब्रांडिंग के चलते (ऐसी मेरी निजी राय है) वैसी कामयाबी नहीं मिली, जो कलकत्ता में वह चख चुका था. इसी ब्रांडिंग के चलते लोगों के मन में यह बात बैठा नहीं पाया कि दिल्ली का मतलब भी स्टेट्समैन. किसी दौर में पंजाब केसरी की तूती पंजाब में बोलती थी. अमर उजाला और जागरण ने चुनौती पेश की तो नेता स्टाइल में वहां के रीडर्स के बीच यही परसेप्शन बनाने की कोशिश की गई कि यूपी वाले भइया लोगों का अखबार है. आपको तो पता ही है कि सिर्फ इश्क ही नहीं, वार और बाजार में भी सब कुछ जायज है. आप अखबार या चैनल के लिए सिर्फ एक पाठक या दर्शक मात्र ही नहीं है, हंड्रेड परसेंट कन्ज्यूमर हैं.

    ऐसी ही मोनोपॉली राजस्थान में राजस्थान पत्रिका की हुआ करती थी और अविभाजित बिहार में हिंदुस्तान की. मगर इस तिलिस्म को तोड़ने के लिए प्रतिद्वंद्वियों ने घाट घाट का पानी पीया. इमैजिन कीजिए सेंध लगाने के लिए हाथी पर बैठकर जब माधुरी दीक्षित शहर में घूमी होंगी तो कितनी क्यूट लग रही होंगी? कैसे महीनों फ्री में अखबार पूरे के पूरे प्रदेश को पढ़वाया गया, ताकि आप एक खास फ्लेवर के एडिक्टटेड हो जाए. किस्म किस्म की स्कीमें चलाई गईं. फ्री में अखबार पढिए, बाइक या कार जीतिए. बहुत कूपन काट काट कर बटोरे होंगे आप भी. ऐसी भी भीड़ अखबारों के दफ्तर में पहुंचती थी कि फलां दिन वाला कूपन काट नहीं पाया था, कृपया उस दिन का पुराना एडिशन दे दीजिए. उस दौर में पत्रकार कूपन मैनेजर भी हुआ करते थे. ठीक वैसे ही जैसे आज शिक्षक क्वारंटीन सेंटरों में भी ड्यूटी बजा रहे हैं.

    तब मेरा पाला भी एक ऐसी ही मकान मालकिन से पड़ा था. चूंकि नौकरी चलाने के लिए शहर के सारे अखबारों पर नजर रखना मेरी जिम्मेदारी थी. सो सारे अखबार मेरे घर आते थे. देर रात घर लौटता तो जाहिर है देर तक सुबह सोता भी. मेरी मकान मालकिन मेरी इस मजबूरी का पूरा पूरा फायदा उठाती. वे ग्राउंड फ्लोर पर ही अखबार पर कब्जा कर लेतीं. जगने पर मैं अब उनसे मांगता कि कृपया जरा मेरा अखबार पढ़ने के लिए दे दीजिए. पता चलता सारे अखबारों के कूपन मैडम ने काट लिए. उन्हें यह मुगालता थी कि अखबार तो इसी का है. क्या करेगा कूपन. इसको तो फ्री में ही मिलता होगा. बाद में मैंने उन्हें जानकारी दी कि मैडम हीरे की फैक्टरी में नौकरी बजाने का यह मतलब कत्तई नहीं है कि तराशे गए हीरे मेरे ही हैं. उन अखबारों का मैं विधिवत भुगतान करता हूं. आपने कूपन काट लिया मुझे ऐतराज नहीं है. मगर अखबार में उस कूपन के पीछे वाली खबर भी कट जाती है. यह मेरे लिए चिंता का सबब है. इस पर उनका तर्क था कि खबरें तो सब रात को आप दफ्तर में पढ़ ही लेते होंगे. वैसे कसूर उनका नहीं था. विशेष तौर पर हिंदी पाठकों की यह परंपरा रही है कि बहुतेरे पाठक अखबार पड़ोसी के यहां ही पढ़ते हैं. या चाय वाले के यहां पढ़ते हैं. इस तरह लोकतंत्र बचाते हुए वे पड़ोसी के यहां ही पकौड़ी संग चाय की चुस्की भी ले लेते हैं. हैं न डबल फायदा. तो मेरी मकान मालकिन को भी किरायेदार पत्रकार रखने का फायदा मिलना ही चाहिए न.

    इतना तो आप भी जानते होंगे. कि फ्री में इस दुनिया में कुछ नहीं मिलता. बाजार में हर डील की कीमत चुकानी पड़ती है. हर फ्री में कुछ न कुछ लोचा होता है. एक बात और गांठ बांध लीजिए. कि अखबार या चैनल विज्ञापन के बूते ही जिंदा हैं. क्योंकि आपको खबरें फ्री में चाहिए. आप जिस कीमत में अखबार खरीदते हैं उसमें कायदे के पान मसाले का छोटा पाउच भी नहीं खरीदा जा सकता.

    बांग्ला में एक कहावत जतो दोष नंदो घोष. अर्थात मैंने तो कोई गलती की ही नहीं. जितनी गलतियां हुई नंदो घोष ने की है. स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में बहुत बारीक फर्क है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (स्वच्छंदता) के नाम पर आप सोशल साइटों पर जितना गंध मचाना चाहें, मचा लिजिए. अपने मन की भड़ांस मिटा लीजिए. आपको कूल बनाए रखने के लिए सोशल साइटों का पुख्ता इंतजाम कर दिया गया है. देखिए लोहिया को मत याद करने लगिएगा. अब वे आउटडेटेड हो चुके हैं. सड़कों पर ट्रैफिक बाधित करना गैरकानूनी है.

    सोशल साइट पर ठीक रहेगा. क्यों…. तो वहीं सुरक्षित बीवी बच्चों के साथ घर में बैठकर ट्वीटर पर ट्रेंड ट्रेंड खेल कर लोकतंत्र का नियमित पाठ जारी ऱखिए. बीच बीच में मीडिया को पानी पी पी कर कोसते रहिए. सारी समस्याओं की जड़ यह मीडिया ही है. हां, सोशल साइटों पर आपके द्वारा फैलाया गया यह दुर्गंध भी मार्केट ही तैयार कर रहा है. बल्कि यूं कह लीजिए फैलवाया जा रहा है. बस तय आपको करना है कि कहां आप कम्पलीट कम्फर्ट फील करते हैं. कौन सा फ्लेवर आपको जंच रहा है. सपोर्ट में या विरोध में. आपके सामने सिर्फ दो आप्शन है. आर या पार. कोई लाइफ लाइन नहीं है. आप ही न चाहते हैं. आपको भगत सिंह भी चाहिए. मगर किलकारी पड़ोसी के आंगन में गूंजनी चाहिए. सब कुछ आपकी ही शर्तेों पर कैसे संभव है. कुछ तो कीमत चुकानी ही पड़ेगी.

    देखिएगा, खरीद कर पान मसाला भले खा लें, पढ़ने के लिए पत्र, पत्रिकाएं और किताबें गलती से भी न खरीदें. यह विशुद्ध फिजुलखर्ची है. और जब भी गुस्सा आए पत्तलकार पत्तलकार जाप शुरू कर दें. आप 500/1000 रुपये पर अपना वोट बेच सकते हैं, डंडा झंडा ढो सकते हैं, किसी भी पॉलिटिकल पार्टी की रैली में हिस्सा ले सकते हैं. सरकार बदलते ही रातों राते पूरे प्रदेश की बेशकीमती लग्जरियस गाड़ियों के झंडे बदल सकते हैं. मगर पत्रकार आपको हमेशा दूध का धूला चाहिए. यह तो गणेश शंकर विद्यार्थी ही लिख गए हैं कि दवात में कलम का आगमन हुआ और कवि पैदा हुए, पीली पत्रकारिता का जन्म तो तभी हो गया था।

  • ब्लैक फंगस के इलाज में 1.5 करोड़ रुपए खर्च करने के बाद भी गंवानी पड़ी आंख….

    ब्लैक फंगस के इलाज में 1.5 करोड़ रुपए खर्च करने के बाद भी गंवानी पड़ी आंख….

    कोरोना के बाद ब्लैक फंगस भी महामारी का रूप ले चुकी है। देश के 25 राज्यों में फैली इस बीमारी ने भी अब कहर मचाना शुरू कर दिया है। इसी बीच महाराष्ट्र के नागपुर से एक चौंकाने वाली खबर सामने आई है। नागपुर के एक व्यक्ति को कोरोना होने के कुछ महीने बाद म्यूकरमाइकोसिस बीमारी हो गई और उसके परिवार ने इलाज के लिए डेढ़ करोड़ रुपये खर्च किए। लेकिन, दुर्भाग्य की बात यह है कि इतना पैसा खर्च करने के बाद भी उस व्यक्ति को अपनी एक आंख हमेशा के लिए गंवानी पड़ी।


    नागपुर के नवीन पॉल जीएसटी विभाग में काम करते हैं। कोरोना के बाद उन्हें म्यूकरमाइकोसिस बीमारी हो गई और इसके इलाज के लिए उन्हें लगातार 6 अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती होना पड़ा। जिसके लिए उन्हें 1 करोड़ 48 लाख रुपये खर्च करने पड़े।
    नवीन पॉल को पिछले कुछ महीनों पहले कोरोना हो गया था जिससे वो ठीक भी हो गए लेकिन कुछ दिनों बाद उन्हें आंखों में दिक्कत होने लगी और दांत हिलने लगे। जब उन्होंने नागपुर के एक डॉक्टर से इस बारे में पूछताछ की तो उन्हें आगे के इलाज के लिए हैदराबाद जाने की सलाह दी गई लेकिन हैदराबाद में कोई खास इलाज नहीं हुआ तो वे मुंबई चले गए।


    मुंबई में एक महीने तक उनका इलाज चला। उस इलाज से भी उन्हें कोई खास फायदा नहीं मिला तो पॉल इलाज के लिए नागपुर वापस लौट आए। यहीं पर उनका इलाज किया गया और डॉक्टर ने उनकी एक आंख निकालने का फैसला किया। परिजनों की सहमति के बाद पॉल की एक आंख निकाल दी गई।
    इन सभी अस्पतालों में इलाज के लिए पॉल को 1 करोड़ 48 लाख रुपये का बिल देना पड़ा। नवीन की पत्नी रेलवे में काम करती हैं इसलिए इन सभी उपचारों के लिए रेल विभाग ने उनकी काफी मदद की। नवीन की पत्नी संगीता ने अपने पति को बचाने के लिए बहुत प्रयास किए। उन्होंने बताया कि जैसे-जैसे उनके पति के इलाज के लिए खर्च बढ़ती जा रही थी, उनके रिश्तेदारों ने भी उनकी बहुत मदद की। उनकी जान बचाने के लिए हर कोई मदद के लिए आगे आ रहा था और नागपुर में डॉक्टरों ने भी बहुत प्रयास किया और नवीन की जान बच गई। पॉल का कहना है कि रेलवे एवं उनके दोस्त एवं परिवार ने उनकी बहुत मदद की।

  • तहसीलदार ने झट से छू लिए नए कलेक्टर के पांव, IAS अफसर ने भी कह दिया “खुश रहो”

    तहसीलदार ने झट से छू लिए नए कलेक्टर के पांव, IAS अफसर ने भी कह दिया “खुश रहो”

    छत्तीसगढ़ में एक अधिकारी की वायरल फोटो सुर्खियों में बनी हुई है । वायरल फोटो में अधिकारी अपने नए कलेक्टर का पैर छूकर स्वागत कर रहे हैं, जबकि स्वागत में पूरा जिला प्रशासन पुष्प गुच्छ के साथ खड़ा नजर आ रहा है । बुधवार की शाम से फोटो जमकर वायरल हो रही है, वायरल फोटो अब लोगों के लिए चर्चा का विषय बना हुआ है ।

    दरअसल, ये पूरा मामला कोरिया जिला कलेक्टर कार्यालय का है, जहां बुधवार को पुराने कलेक्टर SN राठौर को विदाई दी जा रही थी और नए कलेक्टर श्याम धावड़े को पदभार ग्रहण करना था।

    बड़ा भाई मानता हूं

    तहसीलदार मनोज पैकरा ने बताया कि श्याम धावड़े जी के साथ हम पहले भी काम कर चुके हैं। इसलिए मैं उनको अच्छी तरह जानता हूं। मैं उन्हें बड़ा भाई मानता हूं। इसलिए मैंने उनका पैर छू लिया। मनोज ने बताया कि हमने गरियाबंद जिले में साथ काम किया है, इसलिए उनका पैर छू लिया।


    कुछ दिन पहले हुई थी प्रशासनिक सर्जरी


    राज्य सरकार ने पिछले दिनों बड़ी प्रशासनिक सर्जरी की थी। जिसमें कई वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी यहां से वहां किए गए थे। जिसके चलते ही एसएन राठौर को मंत्रालय भेजा गया है और श्याम धावड़े जिले के नए कलेक्टर बनाए गए हैं। धावड़े ने बुधवार को कोरिया जिले के 16वें कलेक्टर के रूप में पदभार ग्रहण किया है। धावड़े इससे पहले बलरामपुर जिले के कलेक्टर थे।

  • हनी ने अपने ट्रैप में लिया एक डॉक्टर को, न्यूड वीडियो कॉलिंग कर लिया झांसे में….

    हनी ने अपने ट्रैप में लिया एक डॉक्टर को, न्यूड वीडियो कॉलिंग कर लिया झांसे में….

    एक हनी ने सोशल मीडिया में दोस्ती कर इस बार एक डॉक्टर को अपने ट्रैप में लिया है. ये डॉक्टर न्यूड वीडियो कॉलिंग के माध्यम से उसके झांसे में आ गया और अब पूरा मामला पुलिस तक पहुंच गया है।

    सोशल मीडिया पर दोस्ती के बाद धोखाधड़ी करने के मामलों में काफी तेजी से इजाफा हो रहा है. ऐसे ही एक केस में शातिरों ने डॉक्टर को फंसा लिया. पहले फेसबुक पर लड़की ने दोस्ती की, फिर हनी ने वॉट्सऐप नंबर लेकर सेक्सी कॉल करने की बात करने लगी. सेक्सी कॉल की बात पर डॉक्टर झांसे में आ गए और उसके बाद ब्लैकमेलिंग के जाल में फंस गए।

    रात करीब 11:00 बजे फेसबुक पर लड़की की फ्रेंड रिक्वेस्ट आया. रिक्वेस्ट एक्सेप्ट करने के बाद युवती ने वॉट्सऐप नंबर मांगा दोनों में बातचीत होती है. लड़की सेक्सी वीडियो कॉल का झांसा देती है. वह वीडियो कॉल कर न्यूड होने लगती है. डॉक्टर भी न्यूड हो जाते हैं. तुरंत कॉल कट जाती है. फिर शुरू होती है ब्लैकमेलिंग और जबरन वसूली. न्यूड फोटो सोशल मीडिया पर वायरल की धमकी देकर डॉक्टर से पैसे ऐंठे जाते हैं. जब ब्लैकमेलिंग का सिलसिला नहीं थमा तो डॉक्टर ने सेंट्रल दिल्ली के आईपी एस्टेट थाने में शिकायत दी. पुलिस ने मंडे को धोखाधड़ी और आईटी एक्ट के तहत केस दर्ज कर जांच शुरू कर दी. बता दें कि उक्त डॉक्टर यमुनापार में रहते है।

    जानकारी के मुताबिक उक्त डॉक्टर ने अब तक 81 हजार रुपए इन ठगों को दे दिए है इसके बाद भी जब ब्लैकमेलिंग बंद नहीं हुई तो उन्होंने पुलिस से मदद मांगी है।

  • सरकारी अस्पतालों में ओपीडी का समय निर्धारण क्यों, मरीजों का बड़ा सवाल…

    सरकारी अस्पतालों में ओपीडी का समय निर्धारण क्यों, मरीजों का बड़ा सवाल…

    रायपुर। लोग समय देखकर बीमार नही होते, परेशानी होने पर ही इलाज कराने पहुंचते है. ऐसे में सरकारी अस्पतालों में ओपीडी का समय निर्धारण क्यों किया जाता है. मरीजों को इस निश्चित समय पर क्यों बुलाते हैं. यह एक गंभीर सवाल है. सरकारी अस्पताल से वापस लौटने वाले लोग कहते हैं कि 12 बजे के बाद ओपीडी बंद हो जाती है. हॉस्पिटल जाने के बाद कहा जाता है कि कल एक बजे के पहले आना. आखिर दिन भर ओपीडी क्यों नहीं होती. यह हाल राज्य के सभी सरकारी हॉस्पिटलों का है. दोपहर के बाद सीनियर डॉक्टर नहीं मिलते.

    मरीजों की गुहा

    जिला अस्पताल से भटक कर निराश वापस लौटने वाली सड्डू निवासी लक्ष्मी साहू ने कहा कि भगवान भरोसे अस्पताल चल रहा है. दोपहर पहुंचे तो डॉक्टर नहीं होते, शाम में तो कोई नहीं रहता. ये कैसी व्यवस्था है. बस दिखाने का बड़ा अस्पताल है।

    वहीं टाटीबंध से इलाज के लिए मेकाहारा पहुंचे जगू यादव ने कहा कि दोपहर के बाद अस्पताल में कोई डॉक्टर नहीं होते. कोई भी रोग हो एक डॉक्टर के पास भेज देते हैं. स्कीन समस्या दिखाने आया था लेकिन कल आने के लिए कहा गया है. मैं तो ठीक कल भी आ जाउंगा लेकिन बीमार लोगों के साथ यही किया जाता है ये खतरनाक है।

    ओपीडी नहीं शाम में एमरजेंसी सेवा

    जिला अस्पताल पंडरी के अधीक्षक आरके गुप्ता ने कहा कि हमारे यहां सुबह 9 से दोपहर 1 बजे तक ओपीडी होता है. सभी डॉक्टर मौजूद रहते हैं. पहले सुबह आठ बजे से दोपहर 2 बजे का होता था जिसे शासन के आदेशानुसार सुबह 9 बजे से 1 बजे किया गया है.

    शासन के आदेश का पालन

    मेकाहारा के अधीक्षक डॉ विनीत जैन ने कहा कि सुबह 8 से दोपहर 2 बजे तक समय निर्धारित है. ओपीडी में लगभग 14 मरीज पहुंच रहे हैं. शाम को कोई ओपीडी सेवा नहीं होता है. एमरजेंसी सेवा चालू रहता है. शासन का आदेश है क्या कर सकते हैं।

    क्या कहते हैं स्वास्थ्य के जानकार

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी अस्पताल में लगभग 90 प्रतिशत डॉक्टर बहुत लेट पहुंचते हैं और एक दो घंटा जल्दी निकल जाते हैं. ओपीडी़ का समय शासन द्वारा निर्धारित होता है. इसके समय बढ़ाने की जरूरत है, नहीं तो गरीब मरीज भी प्रायवेट हॉस्पिटल में मोटी रकम देकर इलाज कराने को मजबूर होंगे. ऐसे में घर का जमीन बेचते हैं. घर के सामान जेवर बेचते हैं. जमीन जायदाद नहीं होने पर कर्ज में दब जाते हैं, ये राज्य के लिए गंभीर समस्या है और इसमें गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।