आरबीआई (RBI) ने यूपीआई (UPI) उपभोक्ताओं को बड़ी राहत दी है। रिजर्व बैंक ने यूपीआई के जरिए कर भुगतान करने की सीमा को एक लाख रुपये से बढ़ाकर 5 लाख रुपये कर दिया है।
आरबीआई गवर्नर ने दास कहा कि चूंकि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर भुगतान सामान्य, नियमित तथा उच्च मूल्य के हैं। इसलिए यूपीआई के जरिए कर भुगतान की सीमा को एक लाख रुपये से बढ़ाकर 5 लाख प्रति लेनदेन करने का निर्णय एमपीसी की बैठक में लिया गया है।
उन्होंने बताया कि इस संबंध में आवश्यक निर्देश अलग से जारी किए जाएंगे। रिजर्व बैंक गवर्नर ने बताया कि अनधिकृत कंपनियों की जांच के लिए डिजिटल ऋण देने वाले एप के सार्वजनिक तौर पर आंकड़े तैयार करने का भी प्रस्ताव है।
उल्लेखनीय है कि आरबीआई के अनुसार यूपीआई का उपयोगकर्ता आधार 42.4 करोड़ पर पहुंच गया है। यूपीआई में ‘डेलिगेटेड पेमेंट्स’ शुरू करने के प्रस्ताव से देशभर में डिजिटल भुगतान की पहुंच और उपयोग में वृद्धि होने की उम्मीद है।
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UPI के जरिए भुगतान की सीमा एक लाख से बढ़ाकर 5 लाख रुपये…
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IAS-IPS या मंत्री बने दलितों के बेटे-बेटियों को क्या नहीं मिलेगा आरक्षण, सुप्रीम कोर्ट जज ने क्यों कहा-एक पीढ़ी तक मिले कोटा….
सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति-जनजाति (SC/ST Reservation) को मिलने वाले आरक्षण पर दिए एक बड़े फैसले में 20 साल पहले दिए अपने ही निर्णय को पलट दिया। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि राज्य एससी-एसटी में ज्यादा वंचित लोगों के उत्थान के लिए कोटे के अंदर कोटा बना सकते हैं। फैसले के दौरान जजों ने एससी/एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर को लागू करने की भी बात कही है। आइए- समझते हैं कि इस ऐतिहासिक फैसले के क्या पेंच हैं और क्या एससी-एसटी आरक्षण में भी क्रीमीलेयर की व्यवस्था लागू की जा सकती है।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की पीठ ने दलितों के आरक्षण को लेकर एक बड़ा फैसला दिया है। कोर्ट ने 6:1 के बहुमत से अनुसूचित जाति के कोटे में सब कैटेगरी बनाने की राज्यों को मंजूरी दे दी है। ये सब कैटेगरी दलितों के आरक्षण के भीतर उन लोगों की होगी, जो आरक्षण के लाभ से अब तक वंचित रहे हैं। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि कोटे में यह कोटा यानी जो उप श्रेणी बनाई गई है, उसे पूरा का पूरा 100 फीसदी आरक्षण नहीं दिया जा सकता है। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने यह फैसला देते हुए स्पष्ट रूप से कहा कि सब क्लासीफिकेशन किसी भी हाल में संविधान के समानता के अधिकार यानी अनुच्छेद 14 और 341 का उल्लंघन नहीं है। इस पीठ में चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ के अलावा जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस बेला त्रिवेदी, जस्टिस पंकज मित्तल, जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा शामिल हैं।
जस्टिस गवई ने क्यों कहा-दलितों और आदिवासियों में कुछ ही लोगों को कोटे का फायदा
जस्टिस बीआर गवई ने कहा कि यह राज्य का कर्तव्य है कि वह ज्यादा पिछड़े लोगों को तवज्जो दे। अनुसूचित जाति और जनजाति में कुछ ही लोग हैं, जो अपने आरक्षण कोटे का फायदा उठा पाते हैं। जमीनी हकीकत से इनकार नहीं किया जा सकता है। एससी-एसटी के भीतर भी ऐसी कैटेगरी हैं, जिन्हें सदियों से दबाया गया।
दलित समुदाय में जो पढ़ेगा-लिखेगा, वही उठा पाएगा आरक्षण का फायदा
सुप्रीम कोर्ट में जज शिवाजी शुक्ला के अनुसार, दरअसल जस्टिस गवई का कहना था कि आरक्षण का लाभ एक खास वर्ग तक को ही मिल पा रहा है। चाहे वो दलित हों या अन्य पिछड़ा वर्ग। दलितों में भी बहुत सी ऐसी कैटेगरी है, जिन तक आरक्षण का लाभ पहुंच ही नहीं पाता। जैसे सरकारी नौकरी में आरक्षण किसी दलित समुदाय के व्यक्ति को तभी मिल सकता है, जब वो पढ़ाई करके प्रतियोगी परीक्षाओं को देने की स्थिति में पहुंचे। जब वह वहां तक पहुंचेगा ही नहीं तो वह आरक्षण का फायदा कैसे उठा सकेगा। यानी अगर किसी राज्य में 15 फीसदी आरक्षण अनुसूचित जातियों के लिए है तो उस 15% के तहत वो कुछ अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण तय कर सकते हैं।
एससी-एसटी में क्रीमीलेयर का सिद्धांत लागू करने पर बात
एडवोकेट शिवाजी शुक्ला के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के 7 जजों में से 4 जस्टिस गवई की इस टिप्पणी पर सहमति जताई कि एससी-एसटी कोटे में भी क्रीमीलेयर का सिद्धांत लागू होना चाहिए। राज्यों को एससी-एसटी कैटेगरी में भी क्रीमी लेयर की पहचान के लिए एक नीति लानी चाहिए। और ऐसे लोगों को कोटे से बाहर करना चाहिए। असली समानता हासिल करने का यही इकलौता रास्ता है। वहीं, जस्टिस विक्रम नाथ ने भी कहा कि ओबीसी में लागू क्रीमीलेयर को लेकर एससी में लागू करना चाहिए। जस्टिस पंकज मित्तल ने कहा अगर पहली पीढ़ी आरक्षण के जरिए हायर स्टेटस पर पहुंच चुकी है तो दूसरी पीढ़ी को यह आरक्षण नहीं मिलना चाहिए। जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने भी जस्टिस गवई के मत का समर्थन किया।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी फैसले पर लागू नहीं
एडवोकेट शिवाजी शुक्ला के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के सामने यह मामला था कि क्या राज्य सरकार एससी-एसटी कोटे में सब कैटेगरी बना सकती है? कोर्ट ने राज्यों को सब कैटेगरी बनाने की सहमति दी है। अब राज्य बनाएं या न बनाएं, ये उन पर निर्भर करता है। सुप्रीम कोर्ट जजों ने यह फैसला देते हुए जो टिप्पणी दी है, वो बस राय भर है। वो बाध्यकारी नहीं है। यह राज्यों की इच्छा पर निर्भर करेगा। साथ ही सब कैटेगरी बनाने से पहले उन्हें इस बारे में पर्याप्त आंकड़े भी देने होंगे कि जिस समुदाय को वो सब कैटेगरी के तहत कोटा देने जा रहे हैं, उनकी आबादी कितनी है और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति क्या है और क्या उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिल पा रहा था।
जस्टिस त्रिवेदी ने इस फैसले से अलग क्या फैसला लिखा
जस्टिस बेला त्रिवेदी ने कहा कि अनुच्छेद 341 के तहत अनुसूचित जाति की प्रेसीडेंशियल लिस्ट में राज्य छेड़छाड़ नहीं कर सकते हैं। किसी जाति को प्रेसीडेंशियल लिस्ट से बाहर करना या अंदर केवल संसद ही कर सकती है। एससी-एसटी लिस्ट में उप कैटेगरी बनाने से अनुच्छेद 341 का मकसद ही खत्म हो जाएगा, जिसमें राजनीतिक पार्टियों के इसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने की आशंका बनी रहेगी।
जब जज ने कहा-आरक्षण नीति भी गुब्बारे जैसी हो गई
जस्टिस पंकज मित्तल ने कहा कि यह आम समझ है कि किसी वर्ग को खुश करने के लिए एक बार जो दिया जाता है, उसे वापस नहीं लिया जा सकता। संविधान के तहत आरक्षित वर्ग के लोगों को दिए गए लाभ भी वापस नहीं लिए जा सकते। एक बार दी गई हर रियायत किशमिश या गुब्बारे की तरह फूलती चली जाती है। आरक्षण की नीति के साथ भी यही हुआ। उन्होंने कहा कि आरक्षण लागू करने से जातिवाद फिर से पनपता है। आरक्षण दलितों के उत्थान के तरीकों में से एक है, लेकिन इसे लागू करने से जातिवाद फिर से पनपता है।
2004 के चिन्नैया फैसले में क्या कहा था सुप्रीम कोर्ट ने
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले से 2004 के ईवी चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य जजमेंट को पलट दिया, जिसमें यह कहा गया था कि राज्य प्रेसीडेंशियल लिस्ट में छेड़छाड़ नहीं कर सकते। इसमें यह कहा गया था कि अनुच्छेद 341 के तहत अनुसूचित जातियों को नोटिफाई किया जा सकता है। इसकी सब कैटेगरी नहीं बनाई जा सकती है। उस वक्त आंध्र प्रदेश सरकार ने भी पंजाब जैसा एक कानून बनाया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अवैध करार दिया था।
50 साल पहले का पंजाब का फैसला, जिसका अंजाम अब
करीब 50 साल पहले 1975 में पंजाब सरकार ने अनुसूचित जाति की नौकरी और कॉलेज के आरक्षण में वाल्मीकि और मज़हबी सिख जातियों के लिए 25 फीसदी कोटा तय किया था, जिसे पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने 2006 में ख़ारिज कर दिया था। खारिज करने का आधार 2004 का एक सुप्रीम कोर्ट का फैसला था, जिसमें कहा गया था कि अनुसूचित जाति की सब-कैटेगरी नहीं बनाई जी सकती। सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि राज्यों के पास ऐसा करने का अधिकार नहीं है, क्योंकि अनुसूचित जाति की सूची अनुच्छेद 341 के तहत राष्ट्रपति की ओर से बनाई जाती है। यानी इसे सिर्फ संसद ही बना सकती है, जिस पर राष्ट्रपति मुहर लगाता है। आखिरकार यह मामला सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की पीठ के पास पहुंचा। -

ईडी-सीबीआई की सारी दलीलें खारिज, जानिए सुप्रीम कोर्ट ने सिसोदिया को जमानत देते हुए क्या कहा….
आखिरकार दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया जेल से बाहर आ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी रिहाई की राह के सारे रोड़े हटा दिए। दो जजों की पीठ ने अपने आदेश में कहा कि सीबीआई और ईडी, दोनों की तरफ से दर्ज मुकदमों में मनीष सिसोदिया को जमानत दी जाती है।
नई दिल्ली: दिल्ली के पूर्व उप-मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी (आप) के नेता मनीष सिसोदिया 17 महीने बाद जेल से बाहर आएंगे। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली शराब नीति मामले में मनीष सिसोदिया को 10 लाख रुपये के मुचलके पर जमानत दे दी है। केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने सिसोदिया की जमानत का पुरजोर विरोध किया, लेकिन जज जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने उनकी दलीलों को खारिज कर दिया। बड़ी बात है कि सिसोदिया को सीबीआई और ईडी, दोनों की तरफ से दर्ज मामलों में जमानत मिल गई दी है। इसलिए अब सिसोदिया के जेल से बाहर आने में कोई अड़ंगा नहीं रह गया है। आइए जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की डिविजन बेंच ने मनीष सिसोदिया को जमानत देते हुए अपने फैसले में क्या कहा।
पासपोर्ट जमा, विदेश नहीं जा पाएंगे सिसोदिया
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि बेल नियम है, जेल अपवाद है। जजों ने अपने आदेश में कहा कि मनीष सिसोदिया की जमान की अर्जी स्वीकार की जाती है। पीठी ने कहा कि दिल्ली उच्च न्यायालय का आदेश खारिज कर दिया जाता है। उन्हें ईडी और सीबीआई दोनों मामलों में जमानत दी जाती है। सिसोदिया ने जमानत की शर्तों के रूप में अपना पासपोर्ट भी पुलिस स्टेशन में जमा कराया और रिपोर्ट की है। सिसोदिया अभी दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने दिया अनुच्छेद 21 का हवाला
अदालत ने यह देखते हुए याचिका स्वीकार कर ली कि मुकदमे में लंबे समय तक देरी ने सिसोदिया के त्वरित सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन किया है और त्वरित सुनवाई का अधिकार स्वतंत्रता के अधिकार का ही एक पहलू है। पीठ ने कहा, ‘सिसोदिया को त्वरित सुनवाई के अधिकार से वंचित किया गया है। त्वरित सुनवाई का अधिकार एक पवित्र अधिकार है। हाल ही में जावेद गुलाम नबी शेख मामले में हमने इस पहलू पर विचार किया और पाया कि जब अदालत, राज्य या एजेंसी त्वरित सुनवाई के अधिकार की रक्षा नहीं कर सकती है, तो यह कहकर जमानत का विरोध नहीं किया जा सकता है कि अपराध गंभीर है। संविधान का अनुच्छेद 21 अपराध की प्रकृति के बावजूद लागू होता है।’इसने कहा कि समय के भीतर सुनवाई पूरी होने की कोई संभावना नहीं है और सुनवाई पूरी करने के उद्देश्य से उसे सलाखों के पीछे रखना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन होगा। पीठ ने कहा, ‘सिसोदिया की समाज में गहरी जड़ें हैं। वो भाग नहीं सकते। सबूतों से छेड़छाड़ के संबंध में मामला काफी हद तक दस्तावेजों पर निर्भर करता है और इसलिए सभी को जब्त कर लिया गया है और छेड़छाड़ की कोई संभावना नहीं है।’
पीएमएलए का मामला नहीं, मुकदमे में देरी का: सुप्रीम कोर्ट
पीठ ने आगे कहा कि धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत आरोपी को जमानत देने के लिए ट्रिपल टेक्स्ट वर्तमान जमानत याचिका पर लागू नहीं होगा क्योंकि याचिका मुकदमे में देरी पर आधारित है। कोर्ट ने कहा, ‘हमने ऐसे निर्णयों पर गौर किया है, जिनमें कहा गया है कि लंबी अवधि की कैद में जमानत दी जा सकती है। वर्तमान मामले में ट्रिपल टेस्ट लागू नहीं होता।’
न्यायालय ने ईडी के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि ट्रायल में देरी इसलिए हुई क्योंकि सिसोदिया ने ट्रायल कोर्ट में कई आवेदन दायर किए थे। कोर्ट ने कहा, ‘ईडी के सहायक निदेशक की कंप्लायंस रिपोर्ट से पता चलता है कि अनर्सिटफाइड डेटा के क्लोन की एक प्रति तैयार करने में 70 से 80 दिन लगेंगे। हालांकि कई आरोपियों ने कई आवेदन दायर किए थे, लेकिन उन्होंने सीबीआई मामले में केवल 13 आवेदन और ईडी मामले में 14 आवेदन दायर किए। ट्रायल कोर्ट ने सभी आवेदनों को स्वीकार कर लिया।’
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट का यह कहना कि उसके पास दायर आवेदनों के कारण सिसोदिया के खिलाफ मुकदमा चलाने में देरी हुई, गलत है। शीर्ष अदालत ने कहा, ‘जब हमने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल से कोई ऐसा आवेदन दिखाने को कहा जिसे ट्रायल कोर्ट ने आधारहीन माना हो, तो वह नहीं दिखाया गया। इस तरह ट्रायल कोर्ट का यह कहना कि सिसोदिया ने ही सुनवाई में देरी की वजह हैं, गलत है और इसे खारिज किया जाता है।’
न्याय का मजाक नहीं उड़ाया जा सकता: उच्चतम न्यायालय
उच्चतम न्यायालय ने कि वह सिसोदिया को ट्रायल कोर्ट या हाई कोर्ट में नहीं भेजेगा क्योंकि उसने सिसोदिया की पिछली जमानत याचिका को खारिज करते हुए आरोपपत्र दाखिल करने के बाद जमानत के लिए उन्हें यहां आने की छूट दी थी। उसने कहा, ‘शुरू में 4 जून के आदेश पर विचार किया गया है। हमने पाया है कि जब सिसोदिया ने इस अदालत में याचिका दायर की थी, तब इस अदालत के पहले आदेश से 7 महीने की अवधि बीत चुकी थी। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने इस तथ्य पर ध्यान दिया कि आरोपपत्र दाखिल किया जाएगा और सुनवाई शुरू होगी। आरोपपत्र दाखिल करने के बाद याचिका को फिर से शुरू करने की स्वतंत्रता दी गई थी। अब सिसोदिया को ट्रायल कोर्ट और फिर उच्च न्यायालय में भेजना सांप-सीढ़ी का खेल खेलने जैसा होगा।’
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह न्याय का उपहास होगा कि उन्हें फिर से ट्रायल कोर्ट में भेजा जाए। न्यायालय ने कहा, ‘प्रक्रियाओं को न्याय से ऊपर नहीं रखा जा सकता है। हमारे विचार में सुरक्षित स्वतंत्रता को आरोपपत्र दाखिल करने के बाद याचिका को पुनर्जीवित करने की स्वतंत्रता के रूप में समझा जाना चाहिए। इसलिए हम प्रारंभिक आपत्ति पर विचार नहीं करते और इसे खारिज किया जाता है। -

एसीबी ने पटवारी को रिश्वत लेते रंगे हाथों किया गिरफ्तार….
रायगढ़ में एक बड़ी कार्रवाई हुई है। एसीबी ने पटवारी को 20 हजार रुपये रिश्वत लेते गिरफ्तार किया है। जानकारी के मुताबिक छाल तहसील कार्यालय क्षेत्र के हल्का क्रमांक 49 का पटवारी हरिशंकर राठिया ने जमीन के एक मामले में ग्रामीण से 25 हजार रुपए की मांग की थी।
पटवारी ने ग्रामीण से गांव की सरकारी भूमि पर कब्जा मामले में पहले 25 हजार की डिमांड की और फिर 20 हजार में मामला सेटल किया। ग्रामीण ने मामले की शिकायत एंटी करप्शन ब्यूरो से की थी। ACB की टीम बुधवार को छाल तहसील मुख्यालय पहुंची और ट्रैप करते हुए पटवारी हरिशंकर को रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़ा। बताया जा रहा है कि करीब 3-4 माह पहले ग्रामीण ने मामले की शिकायत की थी। छाल तहसीदार एनके सिन्हा ने मीडिया को बताया कि ACB की टीम छाल पटवारी कार्यालय में कार्रवाई कर रही है। करीब 20-25 हजार रुपए रिश्वत लेने की शिकायत थी।
जानकारी के मुताबिक ग्रामीण ने गांव की सरकारी भूमि पर कब्जा किया था। जमीन का पट्टा दिलाने के लिए पटवारी ने ग्रामीण से 25 हजार रुपए की मांग की थी। ग्रामीण पटवारी को 20 हजार रुपए पहले दे चुका था। इसके बाद पटवारी ने 5 हजार रुपए की और मांग की। जिसके बाद ग्रामीण ने मामले की शिकायत एंटी करप्शन ब्यूरो से की थी।
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चैतन्य टेक्नो स्कूल में छ़ात्र प्रतिनिधि चुनाव सम्पन्न…
खरसिया। चैतन्य टेक्नों स्कूल खरसिया में विद्यालय के प्राचार्य बिश्वजीत सिंह बाबू के मार्गदर्शन में विद्यालय के जोनल पी ई टी नीरज साहू एवं समस्त शिक्षक, शिक्षिकाओं के सहयोग से छात्र प्रतिनिधियों के चुनाव संपन्न हुआ।
जिसमें हेड गर्ल के रूप में सिमरन अग्रवाल (12 वीं)ए अनुराधा अग्रवाल (12 वीं)ए आरवी अग्रवाल (12 वीं) ने भाग लिया था जिसमें जिसमें बच्चों के द्वारा सिमरन अग्रवाल (12 वीं) को विजेता चयन किया गया ए हेड बॉय उम्मीदवार के रूप में चाहत अग्रवाल (12 वीं) एवं विश्व मित्तल (12 वीं) खडे़ हुए थ, जिसमें चाहत अग्रवाल (12 वीं) को बच्चों के द्वारा विजेता घोषित किया गयाए एवं डेप्युटी हेड बॉय के लिए दिव्यरंजन नायक (10 वीं) एवं अंश अग्रवाल (9 वीं) उम्मीदवार के रूप में खडे़ हुए थे जिसमें अंश अग्रवाल (9 वीं) को विजेता घोषित किया गया। डेप्युटी हेड गर्ल के लिये कृतिका भारद्वाज (9 वीं), स्पोर्ट्स कैप्टन विवेक साहू (10 वीं), सीसीए कैप्टन भाग्य अग्रवाल (12 वीं) के रूप में चयन हुआ।

कक्षा पहली से बारहवीं के छात्र छात्राओं को चार विभागों में विभाजित किया गया हैं, knights, vikings, spartans तथा samurais जिनके हाउस कैप्टन के रूप में समृद्धि अग्रवाल (12 वीं)knights, शिवम साहू (12 वीं) vikings, हरि अग्रवाल (12 वीं) spartans, शुभ अग्रवाल (12 वीं) samurais, का चयन हुआ एवं डेप्युटी हाउस कैप्टन के रूप में पियूष पटेल (9 वीं) vikings, नैतिक प्रहराज (9 वीं) samurais, मानवी राज (9 वीं)knights, तथा रेयांश अली (10 वीं) spartans का चयन हुआ है। ये चुनाव छात्रों के लिए अपने हितों की रक्षा और उनके अधिकारों की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण कदम हैं।
छात्र प्रतिनिधि के रूप में छात्रों की हितों की रक्षा और उनके अधिकारों की सुरक्षा के लिए काम करेंगे छात्र प्रतिनिधियों के चुनाव के अवसर पर स्कूल के प्राचार्य विश्वजीत सिंह बाबू ने कहा छात्रों को प्रतिनिधित्व सौंपने से उनमें नेतृत्व और सामर्थ्य का विकास होता हैं और स्कूल के समस्त छात्र अपने हितों की रक्षा के लिए एक आवाज़ प्राप्त करते हैं। छात्र प्रतिनिधियों के चुनाव के परिणाम से छात्रों में उत्साह और एक नई उम्मीद का माहौल हैं। समस्त विजयी छात्र छात्राओं को चैतन्य टेक्नो स्कूल खरसिया के समस्त स्टॉफ की तरफ से शुभकामनाएं और इस नए नेतृत्व की शुरुआत के लिए बहुत बहुत बधाई दी गयी।
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धूम धाम से मनाया गया खरसिया में तीज उत्सव…
खरसिया। श्रावण तीज के अवसर पर खरसिया राम जानकी मंदिर में ब्राह्मण समाज महिला प्रकोष्ठ के द्वारा तीज उत्सव का कार्यक्रम रखा गया था जिसमे खरसिया नगर की ब्राह्मण समाज की महिलाओं ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया।
विदित हो कि श्रावण शुक्ल पक्ष तृतीया को हरियाली तीज महोत्सव मनाया जाता है इस दिन महिलाएं अपने हाथों में मेहंदी लगाती हैं, हरी चूड़ियां पहनती हैं, और हरे रंग के कपड़ों के साथ सोलह श्रृंगार करती हैं, इस दिन झूले झूलने का भी विशेष महत्व है, विशेष रूप से तो यहां मायके वाले अपनी बेटी के घर में सावन का सिंधारा भी भेजते हैं, वहीं सास अपनी बहुओं को इस दिन विशेष तरह का उपहार देती हैं। तीज महोत्सव के कार्यक्रम में महिलाओं ने झूला झूलते हुए पारंपरिक परिधानों में विभिन्न प्रकार के खेलों का आनंद लिया तथा पारंपरिक पकवानों का भी आनंद लिया। ब्राह्मण समाज महिला प्रकोष्ठ के सदस्यों विमला शर्मा ,संजू शर्मा ,सरोज शर्मा ,सीमा शर्मा,संगीता शर्मा,स्वेता शर्मा,प्रियंका शर्मा, बबली शर्मा, कोमल शर्मा, मीनू शर्मा,पल्लवी शर्मा , दीक्षा शर्मा ,सोनम शर्मा, और आकांक्षा शर्मा के विशेष योगदान से यह कार्यक्रम भव्यता पूर्वक संपन्न हुआ।
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पूजा खेडकर की अफसरी छिनी, भविष्य में भी नहीं बन पाएंगी IAS-IPS, UPSC का बड़ा एक्शन…
संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) ने ट्रेनी आईएएस पूजा खेडकर पर एक्शन लेते हुए उनकी अस्थायी उम्मीदवारी को रद्द कर दिया है. इसके अलावा खेडकर पर भविष्य में होने वाली किसी भी परीक्षा में शामिल होने पर रोक लगाई गई है. खेडकर के तमाम दस्तावेजों की जांच के आधार पर यूपीएससी ने खेडकर को सीएसई-2022 नियमों के उल्लंघन करने का दोषी पाया.
यूपीएससी ने पहले ही इस एक्शन के संकेत दिए थे. हाल ही में यूपीएससी ने पूजा खेडकर के खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी किया था. इस नोटिस पूछा गया था कि क्यों न पूजा खेडकर की सिविल सेवा परीक्षा-2022 की उम्मीदवारी को रद्द किया जाए। यूपीएससी ने इस बाबत एफआईआर भी दर्ज कराई थी.
15 साल के रिकॉर्ड खंगाले गए
पूजा खेडकर मामले की जांच के लिए यूपीएससी ने पिछले 15 साल के डेटा की समीक्षा की. इसके बाद सामने आया कि खेडकर का इकलौता केस था जिसमें यह पता नहीं लगाया जा सका कि खेडकर ने कितनी बार यूपीएससी का एग्जाम दिया. क्योंकि उन्होंने हर बार न केवल अपना नाम बल्कि अपने माता-पित नाम भी बदल लिया था. अब भविष्य में ऐसा न हो सके. इसके लिए यूपीएससी एसओपी को और मजबूत करने की तैयारी कर रही है.झूठे प्रमाण पत्र पर क्या बोला UPSC
झूठे प्रमाणपत्र (विशेष रूप से ओबीसी और PWBD श्रेणियां) जमा करने के सवाल पर यूपीएससी ने स्पष्ट किया कि वह केवल प्रमाणपत्रों की प्रारंभिक जांच करता है. यह जांचा जाता है कि क्या प्रमाण पत्र प्राधिकारी द्वारा जारी किया गया है या नहीं., प्रमाण पत्र की तारीख जैसी बुनियादी चीजें ही जांची जाती हैं. यूपीएससी ने स्पष्ट किया कि उम्मीदवारों द्वारा जमा किए गए हजारों प्रमाणपत्रों की सत्यता की जांच करने का उसके पास न तो अधिकार है और न ही साधन.

कैसे लाइमलाइट में आईं पूजा खेडकर
दरअसल, पूजा खेडकर अपने शौक और सुविधाओं के लिए चर्चा में आई थीं. पूजा खेडकर पर आरोप लगाया गया कि प्रशिक्षु आईएएस अधिकारी के रूप में उन्होंने उन सुविधाओं की मांग की, जिनकी वे हकदार नहीं
थीं. इसके अलावा उन पर एक वरिष्ठ अधिकारी वे चैंबर पर कब्जा करने का भी आरोप है. बताया गया है कि पूजा खेडकर ने अपनी निजी ऑडी कार में लाल बत्ती और ‘महाराष्ट्र सरकार’ के प्लेट लगवाई.
इसके बाद मामले की जांच की गई तो पता चला कि उन्होंने यूपीएससी में सेलेक्शन पाने के लिए फर्जी दस्तावेजों का भी इस्तेमाल किया था. इसके बाद उनपर जांच बैठ गई. उनका ट्रांसफर कर दिया गया. माता-पिता पर भी कई आरोप लगे. पूजा की मां का पिस्टल लहराते हुए वीडियो भी वायरल हुआ था. -

टीआई का दूसरी बार अनुसूचित क्षेत्र में तबादला आदेश निरस्त…
बिलासपुर । हाईकोर्ट ने थाना प्रभारी को दोबारा अनूसूचित क्षेत्र में स्थानांतरित करने के मामले में सुनवाई करते हुए याचिका मंजूर कर ली है । प्रशासनिक आदेश रद्द कर विभाग को नियमनुसार कार्रवाई की स्वतंत्रता भी दी है ।
याचिकाकर्ता विजय कुमार चेलक पुलिस स्टेशन छाल, जिला रायगढ़ के स्टेशन हाउस ऑफिसर के रूप में कार्यरत थे। इनका तबादला जिला सुकमा कर दिया गया। पहले ही वह अनुसूचित जनजातीय क्षेत्र नारायणपुर में पर्याप्त अवधि तक काम कर चुके हैं । एडवोकेट धीरज वानखेड़े ने याचिकाकर्ता का पक्ष रखते कहा कि किसी अन्य जनजातीय क्षेत्र में दूसरी बार स्थानांतरण करना उल्लंघन है और छत्तीसगढ़ पुलिस अधिनियम 2007 की नीति के विपरीत भी है। यह भी कहा कि स्थानांतरण आदेश पारित करते समय इस बात की कोई प्रशासनिक आवश्यकता नहीं दिखाई गई कि, याचिकाकर्ता को फिर से अनुसूचित जनजातीय क्षेत्र में तैनात करने की आवश्यकता क्यों है। रिटर्न में भी यह बात सिरे से गायब है.। कुछ व्यक्तियों के संबंध में स्थानांतरण के आदेश में भी बाद में संशोधन किया गया है।
जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की सिंगल बेंच में सुनवाई हुई । कोर्ट ने कहा कि , प्रासंगिक पुलिस अधिनियम के अवलोकन से यह स्पष्ट होता है कि, प्रशासनिक आवश्यकता के आधार पर कर्मचारी को स्थानांतरित किया जा सकता है, लेकिन जहां तक वर्तमान मामले का संबंध है, विवादित आदेश अनुलग्नक पी-1 में केवल ‘प्रशासनिक आवश्यकता’ शब्द का उल्लेख है, लेकिन याचिकाकर्ता को दूसरी बार अनुसूचित जनजाति क्षेत्र सुकमा में स्थानांतरित करने में क्या प्रशासनिक आवश्यकता थी, इसका उल्लेख नहीं किया गया है। प्रतिवादियों ने भी अपनी ओर से दाखिल रिटर्न में किसी विशिष्ट प्रशासनिक आवश्यकता का खुलासा नहीं किया है। ,इस प्रकार, उपरोक्त के मद्देनजर, ऊपर उल्लिखित प्रासंगिक पुलिस अधिनियम सहित तथ्यात्मक और कानूनी स्थिति पर विचार करते हुए, आरोपित स्थानांतरण आदेश को इस प्रकार से रद्द किया जाता है, जहां तक यह याचिकाकर्ता से संबंधित है। हालांकि, प्रतिवादी सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश और 2007 के प्रासंगिक पुलिस अधिनियम के अनुसार उचित आदेश पारित करने के लिए स्वतंत्र हैं। इन टिप्पणियों के साथ याचिका स्वीकार कर ली गई । -

महिला इंस्पेक्टर निलंबित: सरकारी आवास में प्रेमी के साथ मना रही थी रंगरलियां, आशिक की पत्नी ने रंगे हाथों पकड़ा था…
आगरा। उत्तर प्रदेश के आगरा में एक महिला इंस्पेक्टर को निलंबित कर दिया गया है। पुलिस कमिश्नर जे रविन्द्र गौड़ ने यह कार्रवाई की है। दरअसल, महिला इंस्पेक्टर सरकारी आवास में एक इंस्पेक्टर के साथ कमरे में पकड़ी गई थी। पुरुष इंस्पेक्टर की पत्नी ने मौके पर रंगे हाथों पकड़ा था। पकड़ने के बाद दोनों प्रेमी इंस्पेक्टरों की जमकर पिटाई कर दी थी। यह पूरा मामला आगरा के रकाबगंज थाने का है।
जानकारी के मुताबिक, रकाबगंज थाने में पदस्थ इंस्पेक्टर शैली राणा का थाना परिसर में ही सरकारी आवास है। जहां वे अकेले रहती हैं। शनिवार शाम करीब 4 बजे महिला इंस्पेक्टर अपने आशिक के साथ बिस्तर पर न्यूड थी। इसी दौरान दो महिलाएं और कुछ युवक यहां पहुंच गए और सीधा गाली-गलौज करते हुए शैली राणा के आवास के अंदर चले गए। घर के अंदर से एक युवक और महिला इंस्पेक्टर को खींचते हुए बाहर निकाला।
बताया गया कि युवक भी इंस्पेक्टर है। उसकी तैनाती वर्तमान में मुजफ्फरनगर में है। उसका शैली राणा के साथ प्रेम-प्रसंग चल रहा है। वह मिलने के लिए आया था। इसकी भनक उसके घरवालों को लग गई। इस पर पत्नी, बच्चा और घर के लोग आ धमके और दोनों को रंगे हाथ पकड़ लिया। इसके बाद पिटाई कर दी। जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है। घटना की सूचना मिलते ही DCP सिटी, ACP सदर मौके पर पहुंचे। फिलहाल महिला इंस्पेक्टर शैली राणा को सस्पेंड कर दिया गया है।नोएडा से शुरू हुई थी प्यार की कहानी
दोनों इंस्पेक्टरों के प्यार की कहानी नोएडा से शुरू हुई थी निरीक्षक शैली राणा आगरा तो पवन कुमार मुजफ्फनगर में तैनात है। दोनों निरीक्षक सरकारी आवास में मिलन कर रहे थे। इस दौरान पुरुष इंस्पेक्टर के परिजनों ने दबिश दी और दोनों को रंगे हाथों पकड़ा। इसके बाद जमकर कुटाई कर दी। इस घटना के बाद उत्तर प्रदेश के पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया। नोएडा में भी आपस में पुलिसकर्मी कानाफूसी कर रहे है। -

आरक्षक निकला शराब का तस्कर..एसपी ने किया निलंबित..
गंभीर शिकायत मिलने व आपराधिक गतिविधियों में लिप्त रहने पर दो पुलिसकर्मियों को बर्खास्त किया गया है। पहला मामला बलौदा बाजार जिले का है। वही दूसरा मामला बिलासपुर जिले का है।
बलौदाबाजार जिले में आरक्षक वीरेंद्र बघेल के विरुद्ध गंभीर शिकायतें एवं विभागीय नियमावली के विपरीत जाकर कार्य करने के मामले में विभागीय जांच करवा के आरक्षक के खिलाफ अनुशासनहीनता और अपराधिक कृत्य में शामिल होना पाए जाने पर आरक्षक को बर्खास्त किया गया है।
इसके अलावा बिलासपुर जिले में भी शराब तस्करी में शामिल आरक्षक को बर्खास्त किया गया है। बिलासपुर जिले के सरकंडा थाना क्षेत्र अंतर्गत पुलिस चौकी में एक कार भारी मात्रा में शराब का परिवहन करते हुए पकड़ाई थी। उक्त कार में आरोपी नवीन बोले उर्फ भज्जी एवं बलराम यादव के के कब्जे से पांच बोरियों में 480 पाव देसी मदिरा कुल 86.400 लीटर अवैध शराब एवं परिवहन में प्रयुक्त कार को जप्त किया गया था। आरोपियों से पूछताछ की जानकारी मिली कि कार सकरी थाने में पदस्थ आरक्षक नीलकमल राजपूत की है। नीलकमल राजपूत के द्वारा ही 45 हजार रुपए देकर शराब मंगवाया गया था। गाड़ी से आरक्षक नीलकमल राजपूत का एसबीआई खाता व चेक बुक, खाकी वर्दी, परिचय पत्र व बलवा ड्रिल का सामान मिला था। पूछताछ में जानकारी लगने पर आरक्षक के खिलाफ भी सरकंडा थाने में अपराध दर्ज किया गया था। जिसे पुलिस अधीक्षक ने तत्काल निलंबित भी कर दिया था। अपराध दर्ज होने की जानकारी के बाद आरक्षक फरार हो गया था।आरक्षक के खिलाफ सरकंडा सीएसपी को एसपी ने विभागीय जांच करने के निर्देश दिए थे। सीएसपी की जांच में उजागर हुआ कि आरोपी नीलकमल राजपूत के द्वारा पुलिस की नौकरी की आड़ में भारी मात्रा में अवैध मदिरा की तस्करी करने जैसी आपराधिक गतिविधियों में आरक्षक संलिप्त है। मामले में यह भी देखा गया कि अपने पद का दुरुपयोग करने वाला आरक्षक नीलकमल राजपूत अपराध दर्ज होने पर अपनी पदस्थापना थाना सकरी से बिना किसी प्रकार की सूचना दिए फरार हो गया है। जिससे आरक्षक की आपराधिक संलिप्तता को बल मिलता है।
आरक्षक अपने द्वारा धारित पद का दुरुपयोग करते हुए फिर से ऐसी घटना की पुनरावृत्ति कर सकता है। इसलिए पुलिस अधीक्षक रजनेश सिंह ने भारतीय संविधान की विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए अपराध में संलिप्त आरक्षक नीलकमल सिंह राजपूत को सेवा से बर्खास्त कर दिया है। इसके साथ ही पुलिस अधीक्षक बिलासपुर रजनेश सिंह ने स्पष्ट कर दिया कि पुलिस विभाग का मुख्य कार्य अपराध एवं अपराधियों पर नियंत्रण रखकर आमजन को भय मुक्त वातावरण प्रदान करते हुए शांति एवं कानून व्यवस्था सुनिश्चित करना है पुलिस अधीक्षक ने यह चेताया है कि पुलिस कर्मियों की इस तरह की अपराधिक गतिविधियां क्षम्य नहीं होंगी और उन पर सख्त कार्यवाही की जाएगी।